
कोलकाता/नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (TMC) में हाल ही में हुई बगावत के बाद पश्चिम बंगाल की सियासत में भूचाल आ गया है। पार्टी के कुछ सांसदों के बागी होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरे “ऑपरेशन TMC” के पीछे आखिर असली मास्टरमाइंड कौन है। हैरानी की बात यह है कि जिन नामों की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही थी, वो इसमें सीधे तौर पर शामिल नहीं बताए जा रहे।
झारखंड भाजपा सांसद निशिकांत दुबे, जिन पर TMC सांसदों को तोड़ने का आरोप बार-बार लगाया जा रहा था, और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव का नाम भी सामने आया था। लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक, असली कड़ी कोई और है – आंध्र प्रदेश से जुड़ा एक नाम।
कौन हैं CM रमेश?
रिपोर्ट्स के अनुसार, भाजपा सांसद सीएम रमेश (CM Ramesh), जो आंध्र प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं, इस पूरे ऑपरेशन की एक अहम कड़ी माने जा रहे हैं। एक TMC राज्यसभा सांसद ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “हम जानते हैं कि सीएम रमेश उस वक्त तीन TMC सांसदों के संपर्क में थे।”
यह भी दावा किया जा रहा है कि कांग्रेस सांसद किर्ति आजाद ने एक बार फिर निशिकांत दुबे पर TMC सांसदों को तोड़ने में शामिल होने का आरोप लगाया है। दोनों नेताओं की मुलाकात कथित तौर पर कॉन्स्टीट्यूशन क्लब चुनावों के दौरान हुई थी, जहां राजीव प्रताप रूडी और संजीव बालियान के बीच मुकाबला था।
सुवेंदु अधिकारी की भूमिका पर भी सवाल
रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि पश्चिम बंगाल में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी की करीबी मानी जाने वाली सांसद सायनी घोष जैसे नेताओं को मनाने में अहम भूमिका निभाई। कहा जा रहा है कि कई सांसदों ने सहमति देने से पहले व्यक्तिगत मुलाकात पर जोर दिया था। दावे के मुताबिक, यह सब 8 जून को शताब्दी रॉय के घर पर हुए एक डिनर के दौरान हुआ – उसी दिन जब इंडिया ब्लॉक के सहयोगी दल दिल्ली में मिल रहे थे।
क्या भाजपा का यह आरोप सही है?
बता दें कि भाजपा की ओर से अभी तक इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। यह सभी दावे फिलहाल TMC नेताओं और मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से सामने आ रहे हैं, जिनकी अभी पुष्टि होनी बाकी है।
सिर्फ TMC नहीं, और भी दलों में हलचल
गौरतलब है कि TMC के बाद अब समाजवादी पार्टी में भी टूट की अटकलें तेज हो गई हैं। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने हाल ही में दावा किया कि “पूरी सपा भाजपा में शामिल होने के लिए तैयार बैठी है”, हालांकि सपा ने इन दावों को खारिज कर दिया है। अखिलेश यादव ने इस पर तंज कसते हुए जवाब दिया, “दाना और गाना कब तक चलेगा यह अफसाना।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों के अंदर इस तरह की हलचल और तेज हो सकती है, खासकर आगामी चुनावों से पहले डेलिमिटेशन (परिसीमन) को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच।
स्पष्ट करना जरूरी है कि यह पूरा मामला अभी आरोपों और दावों पर आधारित है, और किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। स्थिति में आगे क्या बदलाव आता है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं।
