Breaking
7 नवम्बर 2026, शनि

इंटरनेट इस्तेमाल हर व्यक्ति और बच्चों का भी मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने ब्लैंकेट बैन नकारा, ‘चाइल्ड मोड’ सुझाया; सोशल मीडिया कंपनियों के लिए सख्त निर्देश, जानिए आप पर क्या असर

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की इमारत का गुंबद और परिसर, नीले आसमान के नीचे (फ़ाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश में साफ कहा है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, और बच्चे भी इसमें शामिल हैं। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह बात बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी ऑनलाइन सामग्री (CSEAM) पर रोक के मामले में कही। 15 अक्टूबर 2026 की तारीख वाला यह 136 पन्नों का आदेश शनिवार, 17 अक्टूबर को सार्वजनिक हुआ, और इसके साथ कोर्ट ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह पाबंदी (ब्लैंकेट बैन) के विचार को भी नामंज़ूर कर दिया।

कोर्ट के शब्दों में, “बच्चों की सुरक्षा और उनकी आज़ादी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। हमारे बच्चे दोनों के हकदार हैं।” फैसला आते ही यह खबर देशभर की सुर्खियों में आ गई; Google Trends India पर मलयालम में ‘सुप्रीम कोर्ट’ (സുപ്രീം കോടതി) सर्च इसी फैसले की खबरों के साथ ट्रेंड करने लगा और X पर भी यह भारत की टॉप न्यूज़ स्टोरीज़ में शामिल रहा। नीचे आसान भाषा में समझिए कि कोर्ट ने क्या कहा, किन बातों पर ज़ोर दिया और आम परिवारों पर इसका क्या असर हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा: मुख्य बातें

  • मौलिक अधिकार: आदेश के पैरा 292 में बेंच ने लिखा कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और निजी स्वतंत्रता) के साथ अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की आज़ादी) के तहत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
  • बच्चे भी बराबर के हकदार: कोर्ट ने कहा कि बच्चों को, उनकी उम्र चाहे जो हो, यही अधिकार हासिल हैं। उन्हें इससे पूरी तरह वंचित करना उतना ही बेतुका होगा जितना यह कहना कि एक तय उम्र से छोटे बच्चों की अंतरात्मा या अभिव्यक्ति की आज़ादी की कोई कीमत नहीं।
  • ब्लैंकेट बैन नहीं: बेंच ने बच्चों की इंटरनेट पहुंच पर पूरी रोक को “अप्रमाणित उपाय, जिनकी असंगतता साबित है” बताया और कहा कि अब तक कोई भी देश यह नहीं दिखा पाया कि ऐसी पाबंदियों से बच्चे ज़्यादा सुरक्षित हुए हैं।
  • निशाना बच्चे नहीं, खतरनाक सामग्री: कोर्ट के मुताबिक बच्चों की सुरक्षा के कदम नुकसानदेह सामग्री और उसके ज़िम्मेदार लोगों पर केंद्रित होने चाहिए। प्लेटफॉर्म की नाकामी के चलते बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना “पीड़ित को ही समस्या समझ लेने” जैसा होगा।
  • ‘चाइल्ड मोड’ का सुझाव: उम्र के हिसाब से कुछ सुरक्षा उपाय ज़रूरी माने गए। कोर्ट ने माता-पिता की सहमति और निगरानी, बच्चों के अकाउंट के लिए अलग ‘चाइल्ड मोड’, अकाउंट डिफॉल्ट रूप से प्राइवेट रखने, अनजान वयस्कों के संपर्क-मैसेज पर रोक और विज्ञापन-सामग्री की मॉडरेशन जैसे उपाय सुझाए। इनके असली तौर-तरीके तय करने का काम केंद्र सरकार पर छोड़ा गया है।
  • हानिकारक साइट्स पर रोक जारी रह सकती है: आदेश में साफ किया गया है कि इस फैसले से केंद्र सरकार को एडल्ट कंटेंट जैसी स्वाभाविक रूप से हानिकारक सामग्री या सेवाओं तक बच्चों की पहुंच रोकने से मना नहीं किया गया है।

मामला क्या है और यह फैसला क्यों आया

यह आदेश जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस बनाम एस. हरीश मामले में दायर अर्ज़ियों (M.A. 2553-2554/2026) पर आया है, जिसका हवाला 2026 INSC 1149 है। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट 23 सितंबर 2024 को एक बड़ा फैसला दे चुका है, जिसमें कहा गया था कि बच्चों के यौन शोषण वाली सामग्री को रखना, देखना या आगे भेजना भी POCSO और IT कानून के तहत अपराध के दायरे में आ सकता है और ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ की जगह CSEAM (चाइल्ड सेक्शुअल एक्सप्लॉइटेशन एंड एब्यूज़ मटेरियल) शब्द इस्तेमाल करने पर ज़ोर दिया गया था।

ताज़ा आदेश में बेंच ने नाराज़गी जताई कि उस फैसले को दो साल से ज़्यादा बीत जाने के बावजूद “कोई उल्लेखनीय प्रगति” नहीं हुई। आवेदकों ने ऐसी खबरें कोर्ट के सामने रखी थीं, जिनमें सोशल मीडिया पर रीडायरेक्ट लिंक और वेबसाइटों के ज़रिए ऐसी सामग्री के कथित पेड प्रमोशन की बात कही गई थी। कोर्ट ने 14 अगस्त 2026 के अपने पिछले आदेश में भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की “गंभीर चूक” पर चिंता जताई थी। इसी पृष्ठभूमि में बेंच ने केंद्र सरकार की मदद से एक विस्तृत ढांचा तय किया।

सोशल मीडिया कंपनियों के लिए कौन से निर्देश

आदेश का बड़ा हिस्सा प्लेटफॉर्म्स (कानूनी भाषा में ‘इंटरमीडियरी’) की जवाबदेही पर है। मुख्य बिंदु इस तरह हैं:

  • नेशनल हैश और URL डेटाबेस: केंद्र सरकार CSEAM की पहचान के लिए एक राष्ट्रीय ‘हैश और URL लिस्ट डेटाबेस’ बनाएगी, जो गृह मंत्रालय के I4C के सहयोग पोर्टल का हिस्सा या अलग रिपॉज़िटरी हो सकता है। किसी सामग्री को इसमें डालने से पहले कम से कम तीन प्रशिक्षित मानव विश्लेषक स्वतंत्र रूप से जांच करेंगे।
  • मैच मिलते ही हटाना: अगर किसी प्लेटफॉर्म पर डेटाबेस से मेल खाती सामग्री मिलती है, तो उसे बिना देरी हटाना होगा। हटाई गई सामग्री की जगह एक नोटिस दिखाना होगा कि यह क्यों हटी।
  • दो घंटे में रिपोर्ट: प्लेटफॉर्म जब खुद या शिकायत के आधार पर ऐसी नई सामग्री हटाए, तो उसकी रिपोर्ट POCSO नियमों के तहत तय अधिकारियों (स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट, स्थानीय पुलिस या साइबर क्राइम पोर्टल) को दो घंटे के भीतर करनी होगी।
  • शिकायत दर्ज करना आसान: हर प्लेटफॉर्म पर CSEAM की शिकायत के लिए अलग, साफ नाम वाली कैटेगरी होगी, जो संबंधित पोस्ट या प्रोफाइल से दो स्टेप के भीतर उपलब्ध हो। हर शिकायत की 24 घंटे में पावती और ट्रैकिंग नंबर देना होगा, और अंतिम फैसला प्रशिक्षित ग्रीवांस ऑफिसर ही लेगा।
  • मासिक रिपोर्ट और ऑडिट: प्लेटफॉर्म्स को हर महीने कंप्लायंस रिपोर्ट छापनी होगी, जिसमें CSEAM शिकायतों का अलग हिस्सा होगा, और इसका स्वतंत्र ऑडिट होगा।
  • जुर्माना और पेवॉल: कोर्ट ने केंद्र से कहा है कि IT कानून और नियमों के उल्लंघन पर प्लेटफॉर्म की हैसियत और टर्नओवर के हिसाब से “मिसाल कायम करने वाले” जुर्माने का ढांचा बनाने पर विचार करे। अगर पेवॉल या सब्सक्रिप्शन के ज़रिए ऐसी सामग्री से कमाई हुई है, तो वह कमाई ज़ब्त होनी चाहिए।

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि हैश-मैचिंग जैसे औज़ारों का इस्तेमाल सिर्फ CSEAM की पहचान और उसे हटाने के लिए होगा, किसी और मकसद के लिए नहीं।

पहले के फैसलों से क्या बदला

2020 के चर्चित अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इंटरनेट के ज़रिए बोलने और व्यापार करने की आज़ादी संविधान से संरक्षित है, लेकिन तब यह सवाल खुला छोड़ दिया गया था कि क्या इंटरनेट तक पहुंच अपने आप में मौलिक अधिकार है। ताज़ा आदेश में बेंच ने 2025 के प्रज्ञा प्रसून फैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें डिजिटल पहुंच को अनुच्छेद 21 का अभिन्न हिस्सा बताया गया था, और कहा कि अब यह मुद्दा “अनसुलझा” नहीं रहा। यानी पहली बार इतनी साफ भाषा में इंटरनेट एक्सेस को हर व्यक्ति, खासकर बच्चों के मौलिक अधिकार के तौर पर दर्ज किया गया है।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब दुनिया के कई देशों में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर उम्र आधारित पाबंदियों की बहस तेज़ है; ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट पर रोक का कानून लागू किया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के उपायों पर “गंभीरता से विचार” करने के बाद जानबूझकर उनका समर्थन नहीं करने की बात लिखी है।

आप पर क्या असर पड़ेगा

  • माता-पिता के लिए: फिलहाल किसी ऐप पर कोई नया नियम तुरंत लागू नहीं हुआ है। कोर्ट ने ‘चाइल्ड मोड’, पैरेंटल कंसेंट जैसे उपायों के तौर-तरीके केंद्र सरकार पर छोड़े हैं। आने वाले महीनों में ऐप्स पर बच्चों के अकाउंट के लिए अलग सेटिंग्स और सहमति की प्रक्रिया दिख सकती है। तब तक मौजूदा पैरेंटल कंट्रोल, प्राइवेट अकाउंट और ‘अनजान लोगों से मैसेज बंद’ जैसी सेटिंग्स का इस्तेमाल करना समझदारी है।
  • बच्चों और छात्रों के लिए: कोर्ट ने माना कि दूरदराज़ इलाकों के कई बच्चों के लिए इंटरनेट ही पढ़ाई और जानकारी का अकेला ज़रिया है, और विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों के लिए यह अपने जैसे लोगों से जुड़ने की जगह है। इसलिए पूरी पाबंदी की जगह सुरक्षित इस्तेमाल पर ज़ोर दिया गया है।
  • शिकायत कैसे करें: अगर आपको किसी प्लेटफॉर्म पर बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री दिखे तो उसे शेयर या डाउनलोड न करें, क्योंकि ऐसा करना खुद अपराध हो सकता है। प्लेटफॉर्म के रिपोर्ट विकल्प का इस्तेमाल करें और राष्ट्रीय साइबर क्राइम पोर्टल (cybercrime.gov.in) या हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करें।
  • टेक कंपनियों के लिए: रिपोर्टिंग की समय-सीमा, ग्रीवांस सिस्टम और ऑडिट जैसे निर्देशों का मतलब है कि प्लेटफॉर्म्स को भारत में अपना कंटेंट-मॉडरेशन ढांचा और मज़बूत करना होगा। मोबाइल-इंटरनेट से जुड़े हाल के दूसरे बड़े नियम बदलाव को समझने के लिए हमारी रिपोर्ट CNAP: अनजान कॉल पर नाम दिखने का नियम भी पढ़ सकते हैं।

आगे क्या

बेंच ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और कानून मंत्रालय के ज़रिए केंद्र सरकार को इन सुझावों और सुरक्षा उपायों पर अमल के लिए दिशानिर्देश, SOP और ज़रूरत पड़ने पर IT कानून व IT नियमों में संशोधन तैयार करने को कहा है। केंद्र को अगली सुनवाई तक हलफनामा देकर प्रगति बतानी है। मामला 10 दिसंबर 2026 को फिर सूचीबद्ध होगा। यानी असली बदलाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार किस तरह के नियम लाती है और प्लेटफॉर्म्स उन्हें कितनी गंभीरता से लागू करते हैं।

बच्चों से जुड़े कानूनों पर अदालतों के नज़रिए को समझने के लिए हमारी रिपोर्ट POCSO पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी और डिजिटल दुनिया में पहचान के दुरुपयोग पर कृति सेनन के पर्सनैलिटी राइट्स केस की खबर भी देख सकते हैं।

ध्यान रखने वाली बातें

यह आदेश किसी ऐप या वेबसाइट को बंद करने का निर्देश नहीं है, और न ही इसमें बच्चों के लिए कोई तय न्यूनतम उम्र घोषित की गई है। कोर्ट ने उम्र आधारित सुरक्षा उपायों को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया है; उसने बस यह कहा है कि ये उपाय अनुपातिक हों और बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह काटने वाले न हों। इस खबर में दी गई जानकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश (2026 INSC 1149) और LiveLaw, The Hindu, Times of India व Law Trend की रिपोर्ट्स पर आधारित है। केंद्र सरकार की ओर से नियम या दिशानिर्देश जारी होने पर हम यह खबर अपडेट करेंगे।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *