दिल्ली में प्रदर्शनों, पुलिस कार्रवाई और जंतर-मंतर को निर्धारित विरोध-स्थल की सूची से हटाने से जुड़े मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को हुई। उसी सुनवाई के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दिल्ली विरोध-प्रदर्शन से जुड़े सात मामलों से अपना नाम वापस ले लिया है। Bar & Bench, Live Hindustan और नवभारत टाइम्स की रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने बार-बार बीच में टोके जाने और कथित तौर पर माइक्रोफोन छीने जाने का हवाला दिया। गूगल ट्रेंड्स इंडिया पर भी “गोपाल शंकरनारायणन” नाम ट्रेंड में रहा। यह संवेदनशील अदालती विषय है—इस रिपोर्ट में आरोपों को कथित/सूत्रों के हवाले से रखा गया है और किसी पक्ष का फैसला नहीं बताया गया है।
क्या हुआ कोर्टरूम में?
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने गुरुवार को दिल्ली प्रदर्शन से जुड़े करीब 46 याचिकाओं पर सुनवाई की। इनमें कथित पुलिस बर्बरता, अवैध हिरासत, आवाजाही पर पाबंदियां, पत्रकारों के अधिकार और जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में डीनोटिफाई किए जाने जैसे मुद्दे शामिल थे। Bar & Bench के अनुसार शंकरनारायणन इन सात मामलों में पक्ष रखने के लिए पूरी तैयारी—नोट्स और ब्रीफ—के साथ पहुंचे थे।
सूत्रों के हवाले से Bar & Bench और Live Hindustan ने बताया कि जब वे बेंच को संबोधित करने की कोशिश कर रहे थे, तब अन्य वकीलों ने बार-बार उन्हें बीच में रोका। नतीजा यह रहा कि वे अपनी दलीलें पूरी नहीं कर सके। कार्यवाही के अंत में जब उन्होंने और बात रखने की कोशिश की, तो उन्हीं के पक्ष की एक वरिष्ठ महिला वकील ने कथित तौर पर उनसे माइक्रोफोन छीन लिया। स्रोतों ने महिला वकील का नाम नहीं दिया है, इसलिए यहां भी नाम नहीं लिखा जा रहा। इसके बाद शंकरनारायणन कार्यवाही खत्म होने से पहले कोर्टरूम से बाहर चले गए।
वकील ने क्या कहा?
Bar & Bench ने उनसे संपर्क कर पुष्टि की। शंकरनारायणन ने पोर्टल से कहा—“The bench failed to control the court. I cannot continue like this. Dignity of the court is more important.” हिंदी में Live Hindustan और नवभारत टाइम्स ने इसी बयान का अनुवाद छापा: पीठ अदालत को नियंत्रित करने में विफल रही; वे इस तरह काम जारी नहीं रख सकते; अदालत की गरिमा ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि मामलों को उनके सीरियल नंबर के क्रम का पालन किए बिना उठा लिया गया। उनके मुताबिक इन मामलों में पेश होते रहने से कहीं ज्यादा जरूरी अदालत की गरिमा और मर्यादा बचाना है। सूत्रों के अनुसार उन्होंने अपने मुवक्किलों को बता दिया है कि आगे इन सात मामलों में वे पेश नहीं होंगे।
अदालत ने उसी दिन क्या आदेश दिए?
वापसी का फैसला सुनवाई के नतीजों से अलग है, लेकिन पाठकों के लिए संदर्भ जरूरी है। Bar & Bench और TV9 Hindi के अनुसार उसी दिन पीठ ने कई याचिकाओं पर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किए। कानून प्रवर्तन एजेंसियों को CCTV फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए। दोनों पक्षों के लिए नोडल वकील नियुक्त किए गए और एक-दूसरे से मिलते-जुलते मामलों को व्यापक श्रेणियों में बांटने को कहा गया, ताकि अलग-अलग जवाबी हलफनामे दाखिल हो सकें। इसके लिए समयसीमा 28 अक्टूबर बताई गई है। प्रदर्शन से जुड़े मुख्य बैच की अगली सुनवाई 3 नवंबर को नियत है। जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के मुद्दे पर भी अदालत ने जांच का रुख अपनाया है—यह अलग कानूनी सवाल है, जिस पर अभी अंतिम फैसला नहीं आया।
इसी श्रृंखला में सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी साक्ष्य संरक्षण पर ध्यान दिया था—दिल्ली प्रदर्शन और CCTV संरक्षण पर हमारी पिछली रिपोर्ट यहां पढ़ें। 16 अक्टूबर को दिल्ली में CJP के ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च के दौरान सुरक्षा व्यवस्था भी चर्चा में रही—कनॉट प्लेस मार्च और पुलिस तैनाती की रिपोर्ट।
यह वापसी क्यों मायने रखती है?
शंकरनारायणन सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई, हिरासत तथा प्रदर्शन के अधिकार से जुड़े कई याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं की ओर से जुड़े बताए जाते हैं। Bar & Bench के विश्लेषण के मुताबिक सात अहम मामलों से एक साथ निकलना इसलिए चर्चा में है क्योंकि सुनवाई अभी शुरुआती चरण में है—नोटिस जारी हुए हैं, सबूत सुरक्षित रखने के आदेश हैं, और नवंबर में अगली बड़ी सुनवाई है। कानूनी रूप से मुवक्किल नए वकील नियुक्त कर सकते हैं; अदालत के आदेश वकील की उपस्थिति पर निर्भर नहीं रहते। फिर भी कोर्टरूम की मर्यादा और सुनवाई की व्यवस्था पर उठे सवाल सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गए हैं।
ध्यान रहे: माइक्रोफोन छीनने का विवरण सूत्रों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित कथित घटना है। अदालत ने इस घटना पर अलग से कोई दोष-निर्धारण या अनुशासनात्मक आदेश (कम से कम उपलब्ध रिपोर्टों में) सार्वजनिक नहीं किया है। इसलिए इसे सिद्ध अपराध या अदालत का निष्कर्ष न समझें।
आप पर क्या असर / आम पाठक क्या समझें?
- अदालती प्रक्रिया चल रही है: दिल्ली प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में नोटिस, साक्ष्य संरक्षण और नवंबर की सुनवाई आगे की राह तय करेंगे। एक वकील के हटने से याचिकाएं अपने आप खारिज नहीं होतीं।
- आरोप ≠ फैसला: टोके जाने या माइक छीनने जैसे दावे समाचार स्रोत हैं; न्यायिक निष्कर्ष अलग प्रक्रिया में आते हैं।
- प्रदर्शन स्थल का सवाल खुला है: जंतर-मंतर को डीनोटिफाई करने की वैधता अभी अदालत के सामने है। शांतिपूर्ण जमाव और यातायात/सुरक्षा का संतुलन कानूनी बहस का केंद्र है।
- पत्रकारिता व नागरिक अधिकार: इन्हीं प्रदर्शनों से जुड़े पत्रकार उत्पीड़न के मुद्दे भी अदालत तक पहुंचे हैं—NWMI याचिका पर हमारी रिपोर्ट।
आगे क्या?
28 अक्टूबर तक नोडल वकीलों को मामलों का वर्गीकरण पूरा करना है। 3 नवंबर को मुख्य बैच की सुनवाई में केंद्र और दिल्ली पुलिस के जवाब, CCTV/डिजिटल साक्ष्य की स्थिति और जंतर-मंतर डीनोटिफिकेशन के आधार पर अदालत आगे बढ़ सकती है। शंकरनारायणन के स्थान पर नए वकील की नियुक्ति याचिकाकर्ताओं पर निर्भर करेगी। TrendFlash इन अदालती विकासों को स्रोत-सहित, तटस्थ भाषा में अपडेट करता रहेगा।
डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सार्वजनिक समाचार स्रोतों पर आधारित सूचनात्मक सारांश है, कानूनी सलाह नहीं। अदालती कार्यवाही चल रही है; आरोपों को सिद्ध तथ्य न समझें।

