फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और X (पहले ट्विटर) जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए भारत में बड़ा बदलाव आ सकता है। केंद्र सरकार इन कंपनियों को मिलने वाली उस कानूनी सुरक्षा पर दोबारा विचार कर रही है, जिसकी वजह से यूजर्स की डाली गई पोस्ट, वीडियो या कमेंट के लिए आमतौर पर प्लेटफॉर्म को सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता। इस सुरक्षा को ‘सेफ हार्बर’ कहा जाता है और यह सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 की धारा 79 से मिलती है।
द इंडियन एक्सप्रेस और बिजनेस स्टैंडर्ड ने सरकारी अधिकारियों के हवाले से 4-5 नवंबर 2026 को यह खबर दी है। दोनों रिपोर्ट्स के मुताबिक चर्चा अभी शुरुआती दौर में है और कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। यानी फिलहाल यह सिर्फ एक प्रस्ताव पर विचार है, कोई नया नियम लागू नहीं हुआ है।
सरकार क्या सोच रही है?
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, दो वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने बताया कि सरकार यह देख रही है कि क्या सेफ हार्बर की सुरक्षा सिर्फ उन सेवाओं तक सीमित की जाए जो जानकारी को केवल एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाती हैं। इनमें इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP), टेलीकॉम कंपनियां और पीयर-टू-पीयर मैसेजिंग प्लेटफॉर्म शामिल हैं। वहीं जो सोशल मीडिया कंपनियां खुद तय करती हैं कि यूजर को कौन-सा कंटेंट दिखेगा, उन्हें यह सुरक्षा पहले की तरह मिलती रहे या नहीं, इस पर सवाल उठाया जा रहा है।
सरकार के अंदर उभर रही सोच यह है कि आज के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सिर्फ “डाकिए” की तरह काम नहीं करते। वे एल्गोरिदम से कंटेंट को रैंक करते हैं, सुझाते हैं और ज्यादा लोगों तक पहुंचाते हैं, साथ ही अपनी कम्युनिटी गाइडलाइंस के आधार पर पोस्ट हटाते या दबाते भी हैं। सरकार के एक हिस्से का मानना है कि यह एक तरह का संपादकीय नियंत्रण है।
बिजनेस स्टैंडर्ड से बात करते हुए एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जो सोशल मीडिया इंटरमीडियरी एल्गोरिदम से यह तय करता है कि यूजर का कंटेंट कहां दिखेगा, कितना प्रमोट होगा या दबाया जाएगा, वह अब सिर्फ पाइपलाइन नहीं रहा, इसलिए ऐसे कंटेंट के लिए “ब्लैंकेट” यानी पूरी सुरक्षा पर दोबारा विचार की जरूरत है। रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ वे प्लेटफॉर्म इस प्रस्तावित बदलाव से बाहर रहेंगे जो पीयर-टू-पीयर मैसेजिंग की सुविधा देते हैं और एक यूजर से दूसरे यूजर तक जाने वाले कंटेंट में दखल नहीं देते।
डीपफेक और आपत्तिजनक वीडियो पर भी नई व्यवस्था का प्रस्ताव
बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक सरकार एक और व्यवस्था का प्रस्ताव ला सकती है। इसके तहत अगर किसी यूजर से जुड़ा डीपफेक या बिना सहमति वाला फोटो-वीडियो प्लेटफॉर्म पर डाला गया है, तो वह यूजर सीधे प्लेटफॉर्म से उसे हटाने की मांग कर सकेगा। अभी ज्यादातर मामलों में ऐसे कंटेंट को हटवाने के लिए पुलिस में शिकायत या कोर्ट के आदेश जैसी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। अधिकारी का कहना है कि ऐसे मामलों में समय सबसे अहम होता है।
सेफ हार्बर क्या है और अभी क्या नियम है?
IT एक्ट की धारा 79 इंटरनेट इंटरमीडियरी, यानी बिचौलिये प्लेटफॉर्म को यूजर्स के डाले गए कंटेंट की कानूनी जिम्मेदारी से बचाती है, बशर्ते वे कुछ शर्तें पूरी करें। शर्तें ये हैं कि प्लेटफॉर्म ने खुद मैसेज भेजना शुरू न किया हो, उसका प्राप्तकर्ता न चुना हो और कंटेंट में बदलाव न किया हो। साथ ही उसे सरकार के तय नियमों के मुताबिक “ड्यू डिलिजेंस” यानी जरूरी सावधानी बरतनी होती है।
यह सुरक्षा बिना शर्त नहीं है। अगर कोई प्लेटफॉर्म किसी गैरकानूनी काम में मदद करता है, या कोर्ट के आदेश अथवा सरकारी नोटिस से जानकारी मिलने के बाद भी गैरकानूनी कंटेंट नहीं हटाता, तो उसकी यह सुरक्षा खत्म हो सकती है। ड्यू डिलिजेंस के नियम IT (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021 में दिए गए हैं, जिनमें शिकायत अधिकारी नियुक्त करना और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की मदद करना जैसी जिम्मेदारियां शामिल हैं।
इसी सुरक्षा की वजह से मेटा, गूगल और X जैसी कंपनियां करोड़ों यूजर्स के कंटेंट पर टिका कारोबार चला पाती हैं, क्योंकि हर पोस्ट के लिए उन्हें प्रकाशक की तरह जवाबदेह नहीं माना जाता। इसलिए इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि यह कदम सरकार और टेक इंडस्ट्री के बीच बड़े टकराव की वजह बन सकता है।
बदलाव कब तक हो सकता है?
दोनों रिपोर्ट्स के मुताबिक सोशल मीडिया कंपनियों से सेफ हार्बर हटाने के लिए IT एक्ट, 2000 में संशोधन करना होगा, जिसे संसद से पास कराना जरूरी है। बिजनेस स्टैंडर्ड से अधिकारी ने कहा कि इसमें समय लगेगा, क्योंकि इस मुद्दे पर सभी पक्षों से सलाह-मशविरा भी करना होगा। सरकार को इस विषय पर कुछ प्रतिनिधित्व और कानूनी सुझाव मिले हैं, जिनका अध्ययन किया जा रहा है।
आप पर क्या असर पड़ेगा?
- अभी कुछ नहीं बदला: यह सिर्फ विचार के स्तर पर है। आपके फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब या X इस्तेमाल करने के तरीके में फिलहाल कोई बदलाव नहीं है।
- कंटेंट पर सख्ती बढ़ सकती है: अगर प्लेटफॉर्म यूजर पोस्ट के लिए कानूनी तौर पर जिम्मेदार हुए, तो वे विवादित या संदिग्ध कंटेंट को पहले से ज्यादा तेजी और सख्ती से हटा सकते हैं। इसका असर क्रिएटर्स और आम यूजर्स दोनों पर पड़ सकता है।
- डीपफेक पीड़ितों को राहत: अगर डीपफेक और बिना सहमति वाले कंटेंट को सीधे प्लेटफॉर्म से हटवाने की व्यवस्था आती है, तो पीड़ितों को लंबी कानूनी प्रक्रिया का इंतजार कम करना पड़ेगा।
- WhatsApp जैसी मैसेजिंग सेवाएं: रिपोर्ट्स के मुताबिक पीयर-टू-पीयर मैसेजिंग सेवाओं को इस प्रस्तावित बदलाव से बाहर रखने की बात है।
आगे क्या?
सरकार की ओर से अभी तक इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक घोषणा या मसौदा जारी नहीं हुआ है। अगर सरकार आगे बढ़ती है, तो पहले मसौदा संशोधन और उस पर सार्वजनिक सलाह की प्रक्रिया की उम्मीद की जा सकती है, उसके बाद ही संसद में बिल आएगा। टेक कंपनियों की ओर से भी इस पर आपत्ति आने की संभावना है। तब तक सोशल मीडिया यूजर्स के लिए मौजूदा IT नियम ही लागू हैं, इसलिए किसी भी फर्जी, भड़काऊ या आपत्तिजनक कंटेंट को शेयर करने से पहले उसकी सच्चाई जरूर जांच लें।
स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस, बिजनेस स्टैंडर्ड (सरकारी अधिकारियों के हवाले से)।

