सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 4 नवंबर 2026 को एक अहम फैसले में कहा कि दो से ज्यादा बच्चे होने पर सजा देने वाले कानून अब अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने यह टिप्पणी पंचायत चुनाव में लागू “दो बच्चों के नियम” (टू-चाइल्ड नॉर्म) से जुड़े एक मामले में की। कोर्ट ने 2003 के अपने ही फैसले जावेद बनाम हरियाणा राज्य पर दोबारा विचार के लिए मामला बड़ी बेंच को भेज दिया है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि कोर्ट ने अभी किसी राज्य का कानून रद्द नहीं किया है। अंतिम फैसला बड़ी बेंच करेगी। इस लेख में जानिए कि मामला क्या था, कोर्ट ने क्या कहा और इसका आम लोगों व चुनाव लड़ने वालों पर क्या असर हो सकता है।
मामला क्या था?
यह केस महाराष्ट्र की काकोडा (Kakoda) ग्राम पंचायत की सरपंच मंगला भीमराव इंगले से जुड़ा है। फैसले के मुताबिक, उनका तीसरा बच्चा 2014 में हुआ था और वे 2022 के पंचायत चुनाव में सरपंच चुनी गईं। बाद में महाराष्ट्र विलेज पंचायत्स एक्ट, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत उन्हें अयोग्य मानकर उनका चुनाव रद्द कर दिया गया, क्योंकि उनके दो से ज्यादा बच्चे थे। हाईकोर्ट से राहत न मिलने पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। केस में प्रतिवादी अमरावती डिवीजन के अतिरिक्त आयुक्त और अन्य हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते समय ही हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी, जिससे वे सरपंच पद पर बनी रहीं। अब कोर्ट ने साफ किया है कि यह अंतरिम आदेश अपील के निपटारे तक जारी रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
37 पन्नों के फैसले में बेंच ने कहा, “हमारी पक्की राय है कि दो से ज्यादा बच्चे होने पर सजा देने वाले कानूनों ने अपनी प्रासंगिकता खो दी है। ऐसे कानूनों की बुनियाद, यानी अधिक जनसंख्या का डर, पिछले कुछ दशकों के जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण ढह गई है।”
फैसले की मुख्य बातें:
- प्रजनन दर में गिरावट: 2003 में जब जावेद फैसला आया था, तब भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) करीब 3.0 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। कोर्ट ने इसके लिए सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की 2024 की रिपोर्ट का हवाला दिया।
- रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे: 2.1 की TFR को “रिप्लेसमेंट रेट” कहा जाता है, यानी इतनी दर पर एक पीढ़ी खुद की जगह ले लेती है। कोर्ट ने कहा कि भारत की आबादी अभी घट नहीं रही, लेकिन TFR इससे नीचे जाने से जल्द ही बुजुर्गों की आबादी बढ़ेगी और काम करने वाली उम्र के लोगों का हिस्सा घटेगा।
- लोकतांत्रिक भागीदारी पर असर: कोर्ट के मुताबिक ऐसे कानून नागरिकों के एक पूरे वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर कर देते हैं, जबकि बच्चों की संख्या का पद संभालने की क्षमता से कोई ठोस संबंध नहीं है।
- अनुच्छेद 21: बेंच ने कहा कि यह नियम लोगों को बच्चे पैदा करने और लोकतंत्र में हिस्सा लेने के बीच “अनुचित चुनाव” करने पर मजबूर करता है, जो अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता (reproductive autonomy) के अधिकार पर असर डालता है।
- महिलाओं पर ज्यादा असर: फैसले में पंचायती राज मंत्रालय द्वारा प्रायोजित 2009 की एक स्टडी का जिक्र है, जो राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में इस नियम के लागू होने पर थी। उसके अनुसार पितृसत्तात्मक माहौल में यह नियम महिलाओं को सशक्त करने के बजाय कमजोर करता दिखा।
कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि फैसला मुख्य न्यायाधीश (CJI) के सामने रखा जाए, ताकि जावेद फैसले पर पुनर्विचार के लिए उपयुक्त बेंच बनाई जा सके।
पृष्ठभूमि: जावेद फैसला और दो बच्चों का नियम
2003 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने हरियाणा पंचायती राज एक्ट, 1994 के उस प्रावधान को सही ठहराया था, जिसके तहत दो से ज्यादा जीवित बच्चों वाले लोग पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकते थे। उस समय कोर्ट ने जनसंख्या विस्फोट और उसके आर्थिक असर की चिंता को आधार बनाया था।
ताजा फैसले में बताया गया है कि ऐसे कानूनों की शुरुआत के. करुणाकरन समिति की रिपोर्ट से जुड़ी है, जिसने पंचायत से संसद तक दो से ज्यादा बच्चों वालों को चुनाव से रोकने की सिफारिश की थी। कई राज्यों ने इसे पंचायती राज संस्थाओं के लिए लागू किया, लेकिन केंद्र स्तर पर ऐसा कोई कानून नहीं बना। 1992 में राज्यसभा में संविधान (79वां संशोधन) विधेयक भी लाया गया था, पर राजनीतिक दलों में सहमति नहीं बन सकी।
आप पर क्या असर पड़ेगा?
- अभी नियम लागू हैं: यह अंतिम फैसला नहीं है। जिन राज्यों में पंचायत या नगर निकाय चुनावों के लिए दो बच्चों का नियम है, वहां वह कानून फिलहाल लागू रहेगा, जब तक बड़ी बेंच या संबंधित राज्य सरकार कोई बदलाव न करे।
- चुनाव लड़ने की तैयारी करने वाले: अगर आप पंचायत या निकाय चुनाव लड़ना चाहते हैं, तो अपने राज्य के मौजूदा नियम जरूर देखें। सिर्फ इस फैसले के भरोसे नामांकन में जोखिम न लें।
- पहले से अयोग्य घोषित लोग: जिनके मामले अदालतों में लंबित हैं, उनके लिए यह फैसला एक मजबूत दलील बन सकता है, लेकिन हर केस में राहत अपने आप नहीं मिलेगी।
- नीति पर बहस: सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से राज्यों पर ऐसे कानूनों की समीक्षा का दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि अब देश की चिंता जनसंख्या वृद्धि से ज्यादा बढ़ती उम्रदराज आबादी की ओर जा रही है।
आगे क्या?
अब मुख्य न्यायाधीश बड़ी बेंच का गठन करेंगे, जो तय करेगी कि जावेद फैसले को पलटा जाए या नहीं। बड़ी बेंच का फैसला आने के बाद ही साफ होगा कि दो बच्चों वाला नियम असंवैधानिक माना जाएगा या नहीं। तब तक मंगला इंगले सरपंच पद पर बनी रहेंगी। इस मामले में अधिवक्ता रुक्मिणी बोबडे ने एमिकस क्यूरी (अदालत की सहायक) के रूप में मदद की।
स्रोत: सुप्रीम कोर्ट का 4 नवंबर 2026 का फैसला (2026 INSC 1193), The Hindu, The Indian Express और ThePrint की रिपोर्ट।

