नई दिल्ली: ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को दिल्ली हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद ने उनकी वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने दिल्ली पुलिस की ओर से मिले “पीस बॉन्ड” नोटिस को चुनौती दी थी। इस नोटिस में उनसे 10,000 रुपये का निजी मुचलका (personal bond) और एक जमानतदार देने को कहा गया था, ताकि जांच पूरी होने तक शांति बनी रहे।
पीटीआई के हवाले से द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, फैसला सुनाते हुए जज ने कहा, “मैं इस स्तर पर रिट याचिका खारिज कर रहा हूं।” हालांकि कोर्ट ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) को कुछ निर्देश भी दिए हैं। फैसले की विस्तृत कॉपी अभी आनी बाकी है।
कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
लाइव लॉ के अनुसार, जस्टिस प्रसाद ने कहा कि इस मामले में “पर्याप्त सुरक्षा उपाय” (adequate safeguards) मौजूद हैं। कोर्ट ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया है कि वह सावधानी बरतें और जांच के संचालन पर कोई भी आदेश पारित करने से पहले नेहा बोरा को सारी सामग्री (all materials) उपलब्ध कराएं। यानी कोर्ट ने नोटिस को रद्द नहीं किया, लेकिन यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि बोरा को अपना पक्ष रखने के लिए वह जानकारी मिले, जिसके आधार पर पुलिस ने कार्रवाई शुरू की।
गौरतलब है कि 22 अक्टूबर को करीब ढाई घंटे की सुनवाई के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। उस सुनवाई का पूरा ब्योरा आप हमारी पिछली रिपोर्ट नेहा बोरा पीस बॉन्ड केस: दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा में पढ़ सकते हैं।
पूरा मामला क्या है?
नेहा बोरा ने 16 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के तहत शाम 5 बजे मंडी हाउस पर इकट्ठा होने और कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का आह्वान किया था। द हिंदू के मुताबिक, वह कनॉट प्लेस में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च में शामिल होने जा रही थीं, तभी उन्हें एहतियाती हिरासत में ले लिया गया। याचिका के अनुसार, उन्हें करीब शाम 5:30 बजे हिरासत में लिया गया, फिर आर.के. पुरम थाने ले जाया गया और रात भर रखने के बाद 17 अक्टूबर सुबह 6 बजे छोड़ा गया।
इसके बाद 17 अक्टूबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 के तहत नोटिस जारी हुआ, जो बोरा को 18 अक्टूबर को मिला। इसमें उन्हें 19 अक्टूबर को SEM के सामने पेश होकर यह बताने को कहा गया कि उनसे 10,000 रुपये का मुचलका एक जमानतदार के साथ क्यों न लिया जाए।
नोटिस में पुलिस ने क्या आरोप लगाए?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, SEM के सामने चल रही कार्यवाही तीन मुख्य आरोपों पर आधारित है:
- 16 अक्टूबर को मंडी हाउस पर कथित नारेबाजी।
- BNSS की धारा 163 के तहत लगी निषेधाज्ञा के बावजूद जंतर-मंतर के आसपास बार-बार प्रदर्शन।
- 16 अक्टूबर के प्रदर्शन में लोगों को शामिल होने के लिए कथित तौर पर उकसाना।
ध्यान रहे, ये सभी पुलिस के आरोप हैं। नेहा बोरा ने इन्हें गलत बताया है और अभी इनकी जांच मजिस्ट्रेट के स्तर पर होनी है।
बोरा और पुलिस की दलीलें
बोरा की याचिका वकील अभिक चिमनी ने तैयार की थी। इसमें कहा गया कि नोटिस अस्पष्ट और तथ्यात्मक रूप से गलत है और इसमें ऐसी कोई सामग्री नहीं है जिससे शांति भंग होने की “संभावना” साबित हो। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी थी कि प्रदर्शन का आह्वान शांतिपूर्ण था, नागरिकों को तिरंगा फहराने के लिए अनुमति की जरूरत नहीं है और लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की मांग करना गलत नहीं है।
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने कहा था कि धारा 126 में मजिस्ट्रेट की “व्यक्तिपरक संतुष्टि” का दायरा बड़ा है; इसके लिए हर बात का सबूत जरूरी नहीं, बल्कि यह दिखना चाहिए कि क्या सूचना मिली थी। पुलिस ने यह भी कहा कि मंडी हाउस समेत उस इलाके में धारा 163 लागू थी।
समझिए: BNSS की धारा 126 और पीस बॉन्ड
BNSS की धारा 126 ने पुराने CrPC की धारा 107 की जगह ली है। अगर मजिस्ट्रेट को भरोसेमंद सूचना मिलती है कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है या सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ सकता है, तो वह उससे कारण पूछ सकता है कि उससे शांति बनाए रखने का मुचलका क्यों न लिया जाए। धारा 135(3) के तहत मजिस्ट्रेट लिखित कारण दर्ज करके जांच पूरी होने तक अंतरिम मुचलका भरवा सकता है, और मुचलका न भरने पर व्यक्ति को हिरासत में भी रखा जा सकता है। यह कोई सजा नहीं, बल्कि एहतियाती (preventive) कार्रवाई है। इसमें किसी अपराध का दोष साबित नहीं होता।
आगे क्या होगा?
- मजिस्ट्रेट के सामने कार्यवाही जारी रहेगी: याचिका खारिज होने से SEM के सामने चल रही जांच अब आगे बढ़ेगी। कोर्ट के निर्देश के मुताबिक, कोई आदेश देने से पहले बोरा को सारी सामग्री दी जाएगी, जिससे वह आरोपों का जवाब दे सकेंगी।
- ऊपरी अदालत का रास्ता: बोरा के पास हाईकोर्ट के फैसले को डिवीजन बेंच या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का कानूनी विकल्प है। उनकी ओर से अगला कदम क्या होगा, इसकी आधिकारिक जानकारी अभी सामने नहीं आई है।
- विस्तृत फैसले का इंतजार: जज ने किन आधारों पर याचिका खारिज की, यह विस्तृत आदेश आने के बाद ही साफ होगा।
आम लोगों के लिए इसका मतलब
यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि धारा 126 जैसे एहतियाती प्रावधानों का इस्तेमाल अक्सर प्रदर्शनों से पहले या बाद में किया जाता है। इस फैसले से साफ है कि हाईकोर्ट ने फिलहाल मजिस्ट्रेट स्तर की प्रक्रिया में दखल देने से इनकार किया है, लेकिन साथ ही प्रभावित व्यक्ति को सामग्री देने जैसी प्रक्रियागत सुरक्षा पर जोर दिया है। अगर किसी को ऐसा नोटिस मिलता है, तो उसके पास मजिस्ट्रेट के सामने पेश होकर अपना पक्ष रखने, वकील की मदद लेने और जिस सूचना के आधार पर कार्रवाई हुई उसे मांगने का अधिकार है।
(यह खबर द हिंदू/पीटीआई, लाइव लॉ और डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट्स पर आधारित है। विस्तृत फैसला आने पर इसे अपडेट किया जाएगा।)

