सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए कारगिल में तैनाती के दौरान रूमेटॉइड आर्थराइटिस से पीड़ित हुए एक सेना के पूर्व जवान को ‘वॉर इंजरी पेंशन’ देने का आदेश बरकरार रखा। इंडिया टुडे (पीटीआई के हवाले से) और लाइवलॉ की रिपोर्टों के अनुसार जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने कहा कि सरकार अपनी ही नीति की व्याख्या उसके स्पष्ट शब्दों के विपरीत नहीं कर सकती।
मामला क्या है
इंडिया टुडे के अनुसार जवान दिसंबर 1996 में सेना में भर्ती हुए थे; लाइवलॉ और लेक्सस्ट्रीक ने उनका नाम नरेंदर कुमार बताया है। वे जुलाई 2003 से जुलाई 2005 तक कारगिल में ‘ऑपरेशन रक्षक’ के तहत तैनात थे, जब उन्हें रूमेटॉइड आर्थराइटिस हुआ। 16 साल से ज्यादा सेवा के बाद 2013 में डिस्चार्ज होने पर उन्हें दिव्यांगता पेंशन मिली। करीब छह साल बाद वे सशस्त्र बल अधिकरण (AFT) पहुंचे और कहा कि उनकी दिव्यांगता सीधे कारगिल की तैनाती का नतीजा है, इसलिए उन्हें वॉर इंजरी पेंशन मिलनी चाहिए। रक्षा मंत्रालय के 31 जनवरी 2001 के नीति पत्र की श्रेणी E(i) “सरकार द्वारा समय-समय पर विशेष रूप से अधिसूचित ऑपरेशनों” से जुड़ी है।
निचली अदालतों के फैसले
- अप्रैल 2024 में अधिकरण ने उनका दावा मंजूर किया। उसने माना कि बीमारी कारगिल की तैनाती के दौरान शुरू हुई थी।
- इसके बाद पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने केंद्र की चुनौती खारिज कर दी। इंडिया टुडे के अनुसार हाईकोर्ट ने रिलीज मेडिकल बोर्ड की राय को आधार बनाया, जिसमें बीमारी कारगिल की तैनाती के दौरान शुरू होना दर्ज था।
- केंद्र सरकार इन आदेशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
केंद्र की दलील और कोर्ट का जवाब
सरकार का कहना था कि 2001 का नीति पत्र सिर्फ “विशेष रूप से अधिसूचित ऑपरेशनों” पर लागू होता है, जैसे ऑपरेशन सिंदूर या ऑपरेशन स्नो लेपर्ड, न कि जम्मू-कश्मीर में चल रहे ऑपरेशन रक्षक या असम में ऑपरेशन राइनो जैसे चालू अभियानों पर।
कोर्ट ने यह दलील नहीं मानी। इंडिया टुडे के अनुसार पीठ ने कहा कि नीति बनाने और उसकी लागू होने की शर्तें तय करने का अधिकार रक्षा प्रशासन के पास है, लेकिन नीति में उसका दायरा और उसका प्रयोग साफ शब्दों में लिखा होना चाहिए। लाइवलॉ और लेक्सस्ट्रीक की रिपोर्टों के अनुसार कोर्ट ने माना कि जब कोई ऑपरेशन अधिसूचित हो, तो श्रेणी E(i) उस पर लागू होती है, जब तक नीति या अधिसूचना उसे साफ तौर पर बाहर न करे; ऑपरेशन रक्षक को बाहर रखने का कोई आधार नहीं मिला।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां
- “नीति की सरल भाषा की व्याख्या करते समय अदालतें सिर्फ वही बताएंगी जो नीति में लिखा है, न कि जो नीति-निर्माता की कल्पना में है।”
- अगर नीति-निर्माता अपनी ही नीति की व्याख्या उसकी साफ भाषा के खिलाफ, भेदभावपूर्ण, मनमाने या अतार्किक ढंग से करे, तो अदालतें उस व्याख्या को नजरअंदाज करेंगी।
- इंडिया टुडे के अनुसार पीठ ने कहा कि लागू नियमों को लेकर अनिश्चितता क्यों बनी रहती है, यह हैरान करता है।
रक्षा मंत्रालय के लिए निर्देश
कोर्ट ने कहा कि अब समय आ गया है कि रक्षा मंत्रालय सेवाओं को नियंत्रित करने वाला व्यापक और स्पष्ट रूप से पहचाने जाने योग्य अधीनस्थ कानून जारी करे, ताकि निष्पक्षता और सुशासन सुनिश्चित हो। श्रेणी E(i) के तहत ऑपरेशन अधिसूचित करते समय सरकार को “स्पष्ट शब्दों में” बताना होगा कि किसे कौन से पेंशन लाभ मिलेंगे।
इस फैसले का मतलब
यह फैसला सिर्फ इसी मामले के संदर्भ में दिया गया है, लेकिन कोर्ट की टिप्पणी बताती है कि पेंशन से जुड़े नियमों में स्पष्टता की जिम्मेदारी सरकार की है। ऐसे मामलों में किसे वॉर इंजरी पेंशन मिलेगी, यह हर मामले के तथ्यों और अधिसूचना पर निर्भर करेगा। पूर्व सैनिक अपने मामले के लिए कानूनी सलाह लें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
कोर्ट ने केंद्र की अपील खारिज कर कारगिल के पूर्व सैनिक को वॉर इंजरी पेंशन देने का आदेश बरकरार रखा।
सैनिक को कौन सी बीमारी हुई थी?
रूमेटॉइड आर्थराइटिस, जो कारगिल की तैनाती (ऑपरेशन रक्षक) के दौरान सामने आई।
कौन सी पीठ ने फैसला दिया?
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने।
कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय से क्या कहा?
व्यापक और स्पष्ट नियम जारी करने और ऑपरेशन अधिसूचित करते समय लाभ साफ बताने को कहा।
नोट: जानकारी इंडिया टुडे (पीटीआई) और लाइवलॉ की 28 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टों पर आधारित है।

