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6 नवम्बर 2026, शुक्र

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को भारतीय नौसेना के जज एडवोकेट जनरल (JAG) ब्रांच की महिला अधिकारी कमांडर सीमा चौधरी को परमानेंट कमीशन न देने का नौसेना सिलेक्शन बोर्ड का फैसला रद्द कर दिया। इंडिया टुडे और इंडिया लीगल की रिपोर्टों के अनुसार कोर्ट ने बोर्ड को छह हफ्ते में उनके दावे पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने क्या कहा

कोर्ट ने 12 अप्रैल 2024 के सिलेक्शन बोर्ड के फैसले को रद्द किया। इंडिया लीगल के अनुसार कोर्ट ने कहा कि बोर्ड ने अधिकारी की सालाना गोपनीय रिपोर्टों (ACR) में दर्ज अनुकूल मूल्यांकन को पर्याप्त महत्व नहीं दिया और पहले की गैर-सिफारिशों को जरूरत से ज्यादा तवज्जो दी।

बोर्ड के फैसले में दो खामियां

  • बोर्ड ने इस तथ्य को पर्याप्त महत्व नहीं दिया कि अधिकारी को ज्यादातर ACR में पदोन्नति के लिए जरूरी ग्रेडिंग मिली थी।
  • उनके समग्र रिपोर्ट कार्ड में संतोषजनक और कई मामलों में मजबूत प्रदर्शन दर्ज था, जिसे पुरानी गैर-सिफारिशों से दबाया नहीं जा सकता।

कोर्ट ने सवाल उठाया कि जो अधिकारी पदोन्नति के तय मानक पूरे करता हो, उसे परमानेंट कमीशन के लिए अनुपयुक्त कैसे माना जा सकता है।

खाली कॉलम पर अहम निर्देश

इंडिया लीगल के अनुसार कोर्ट ने नोट किया कि सीमा चौधरी को 2013 और 2014 में परमानेंट कमीशन के लिए सिफारिश मिली थी, जबकि 2008 से 2012 की रिपोर्टों में संबंधित कॉलम खाली छोड़ा गया था। कोर्ट ने कहा कि किसी प्रविष्टि का न होना अधिकारी के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसलिए 14 जुलाई 2008 से 31 अक्टूबर 2014 तक की गोपनीय रिपोर्टों को ऐसा माना जाएगा जैसे उनमें परमानेंट कमीशन की सकारात्मक सिफारिश दर्ज थी। हालांकि पीठ ने साफ किया कि वह अधिकारी के पूरे सेवा रिकॉर्ड की हर ACR पर विचार करने का निर्देश नहीं दे रही है और कौन सी रिपोर्टें देखी जाएंगी, यह सक्षम प्राधिकारी तय करेगा।

पृष्ठभूमि

इंडिया लीगल के अनुसार सीमा चौधरी अगस्त 2007 में नौसेना की JAG ब्रांच में शॉर्ट सर्विस कमीशंड अधिकारी के रूप में शामिल हुईं। उन्हें 2009 में लेफ्टिनेंट और 2012 में लेफ्टिनेंट कमांडर के पद पर पदोन्नति मिली। सेवा विस्तार मिलने के बाद अगस्त 2020 में उन्हें बताया गया कि अगस्त 2021 में उन्हें सेवा से मुक्त किया जाएगा। उनके परमानेंट कमीशन का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

कोर्ट ने अपने पहले के फैसले में नौसेना को निर्देश दिया था कि उनके दावे पर “स्टैंडअलोन” आधार पर, यानी पुराने विचार या सशस्त्र बल अधिकरण की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना, विचार किया जाए। अधिकारी की ओर से दलील दी गई कि बाद के फैसले में नौसेना ने फिर वही बातें आधार बनाईं जिन्हें नजरअंदाज करने को कहा गया था।

सरकार की दलील

नौसेना की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि नौसेना ने पहले के निर्देशों का पालन किया है। उनके अनुसार “स्टैंडअलोन” विचार का मतलब अन्य अधिकारियों या रिक्तियों से तुलना किए बिना स्वतंत्र आकलन है, न कि अधिकारी का सेवा रिकॉर्ड नजरअंदाज करना। उन्होंने यह भी कहा कि परमानेंट कमीशन अनुकूल आकलन या सेवा विस्तार का अपने आप मिलने वाला नतीजा नहीं है। इंडिया लीगल के अनुसार उन्होंने चिंता जताई कि फैसले का मतलब हर अधिकारी की पूरी सेवा-हिस्ट्री देखना न समझा जाए।

आगे क्या

अब नौसेना का सिलेक्शन बोर्ड दोबारा बैठकर छह हफ्ते के अंदर कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप सीमा चौधरी के दावे पर फैसला लेगा। परमानेंट कमीशन का अंतिम निर्णय लागू नियमों और आकलन मानदंडों के अधीन रहेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?

सिलेक्शन बोर्ड का 12 अप्रैल 2024 का फैसला रद्द कर छह हफ्ते में नया आकलन करने को कहा।

सीमा चौधरी कौन हैं?

वे भारतीय नौसेना की JAG ब्रांच में कमांडर हैं, जो 2007 में शॉर्ट सर्विस कमीशन से शामिल हुई थीं।

क्या उन्हें परमानेंट कमीशन मिल गया है?

नहीं। कोर्ट ने सिर्फ फैसले पर पुनर्विचार का निर्देश दिया है; अंतिम निर्णय बोर्ड लेगा।

नोट: जानकारी इंडिया टुडे और इंडिया लीगल की 28 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टों पर आधारित है।

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