धार जिले के भोजशाला परिसर का विवाद अब एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिकाओं के बैच को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है, जिसमें मुस्लिम पक्ष ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर को देवी सरस्वती (वागदेवी) को समर्पित मंदिर बताया गया था �।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति ज्योयमाल्य बागची तथा वी. मोहन की बेंच के सामने वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी और अधिवक्ता निजाम पाशा ने मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश होकर कहा कि इस मामले में तुरंत सुनवाई की जरूरत है �। मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं के वकीलों को याचिकाओं में मौजूद कमियों को दूर करने का निर्देश दिया और भरोसा दिलाया कि मामला जल्द ही किसी बेंच के सामने लिस्ट किया जाएगा �।
क्या था हाईकोर्ट का फैसला
यह पूरा विवाद मई 2026 में तब चरम पर पहुंचा जब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने भोजशाला परिसर को देवी वागदेवी (सरस्वती) के मंदिर के रूप में मान्यता दी और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को वहां नमाज अदा करने की अनुमति थी �।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि साइट पर हिंदू पूजा की निरंतरता कभी खत्म नहीं हुई और ऐतिहासिक साहित्य तथा रिकॉर्ड्स से यह साबित होता है कि भोजशाला राजा भोज के काल में संस्कृत शिक्षा का केंद्र था, जहां देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर मौजूद था �। कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि केंद्र सरकार लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी वागदेवी की मूर्ति को वापस लाने पर विचार कर सकती है �।
इस फैसले के साथ ही 23 सालों से चला आ रहा वह समझौता भी खत्म हो गया, जिसके तहत मंगलवार को हिंदू और शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय पूजा-नमाज करते थे। अब वहां सिर्फ हिंदू पूजा-अर्चना की अनुमति है, जबकि मुस्लिम पक्ष के काजी मोइनुद्दीन ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है �।
हिंदू पक्ष की प्रतिक्रिया
फैसले के बाद अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने इसे “ऐतिहासिक फैसला” करार दिया और कहा कि कोर्ट ने हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार दिया है तथा भोजशाला परिसर को राजा भोज से जोड़ी गई विरासत के रूप में मान्यता दी है �। मध्य प्रदेश सरकार ने भी घोषणा की है कि भोजशाला परिसर को अयोध्या के राम मंदिर की तरह विकसित किया जाएगा �।
मुस्लिम पक्ष का विरोध और सुरक्षा व्यवस्था
दूसरी ओर, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी समेत कई मुस्लिम संगठनों ने इस फैसले की आलोचना करते हुए सुप्रीम कोर्ट जाने का ऐलान किया था �। हिंदू पक्ष ने भी सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल कर मांग की है कि किसी भी अपील पर सुनवाई से पहले उन्हें भी सुना जाए �।
फैसले के बाद से धार जिले में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। जिला कलेक्टर राजीव रंजन मीना ने शांति बनाए रखने की अपील की और प्रशासन को अफवाहों पर सख्त नजर रखने के निर्देश दिए हैं �।
अब आगे क्या
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला अब लिस्टिंग का इंतजार कर रहा है। एक तरफ मुस्लिम पक्ष हाईकोर्ट के फैसले को पलटने की कोशिश करेगा, तो दूसरी तरफ हिंदू पक्ष अपनी बात रखने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह मामला सिर्फ एक धार्मिक स्थल का विवाद नहीं रहा, बल्कि यह देश में धार्मिक अधिकारों, पुरातात्विक साक्ष्यों और संवैधानिक प्रावधानों के बीच के जटिल रिश्ते को भी उजागर करता है।
गौर करने वाली बात यह है कि यह विवाद दशकों पुराना है और 2003 के ASI आदेश ने ही दोनों समुदायों के बीच पूजा-नमाज का बंटवारा तय किया था। अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि आने वाले समय में भोजशाला परिसर का भविष्य क्या होगा — क्या यह पूरी तरह मंदिर के रूप में स्थापित होगा, या फिर कोई नया समाधान सामने आएगा।