दशहरा और दिवाली से ठीक पहले रसोई का सबसे ज़रूरी सामान—चीनी—फिर महंगी होने लगी है। गूगल ट्रेंड्स इंडिया पर शुक्रवार (16 अक्टूबर 2026) को “चीनी” सर्च ट्रेंड कर रहा था, और वजह साफ़ है: हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय व्यापारियों के हवाले से उत्तर प्रदेश में चीनी का एक्स-मिल भाव 6 अक्टूबर के ₹4,600 से बढ़कर 12 अक्टूबर को ₹5,200 प्रति क्विंटल (करीब 13%) हो गया, जबकि महाराष्ट्र में यह ₹4,350 से ₹5,100 (करीब 17%) पहुंच गया। आगरा से लेकर पंजाब के रोपड़ तक व्यापारी सप्लाई की कमी की शिकायत कर रहे हैं। नीचे समझिए कि दाम क्यों बढ़े, सरकार ने अब तक क्या किया है और त्योहार के बजट पर इसका क्या असर पड़ सकता है।
कितने बढ़े दाम? आंकड़ों में पूरी तस्वीर
- एक्स-मिल (मिल से निकलने वाला) भाव: UP में ₹4,600 → ₹5,200 प्रति क्विंटल, महाराष्ट्र में ₹4,350 → ₹5,100 प्रति क्विंटल (6 से 12 अक्टूबर, व्यापारियों के हवाले से HT)।
- बिज़नेस स्टैंडर्ड के अनुसार पिछले करीब 10 दिनों में एक्स-मिल भाव लगभग ₹1,000 प्रति क्विंटल चढ़े।
- सरकारी आंकड़ा: उपभोक्ता मामले विभाग के डेटा के मुताबिक 13 अक्टूबर को चीनी का अखिल भारतीय औसत खुदरा भाव ₹56.67 प्रति किलो और औसत थोक भाव ₹5,254.91 प्रति क्विंटल था (बिज़नेस स्टैंडर्ड)।
- ज़मीनी हाल: अमर उजाला ने 14 अक्टूबर को आगरा में फुटकर भाव ₹62 प्रति किलो तक बताया। पंजाब के रोपड़ में कुछ व्यापारियों का दावा है कि बिचौलियों के ज़रिये उन्हें ₹70 प्रति किलो तक चुकाने पड़ रहे हैं (द ट्रिब्यून)। ये स्थानीय व्यापारियों के आरोप हैं, आधिकारिक दर नहीं।
दिलचस्प बात यह है कि 1 अक्टूबर को PIB की प्रेस रिलीज़ में सरकार ने कहा था कि खुदरा दाम अगस्त के उच्च स्तर से करीब 15% और एक्स-मिल दाम करीब 28% नीचे आ चुके हैं। यानी सितंबर की राहत दो हफ्तों में ही उलटती दिख रही है।
दाम क्यों बढ़े? चार बड़ी वजहें
1. त्योहारी मांग: नवरात्र, दशहरा और दिवाली पर घरों के साथ-साथ हलवाई, पेठा और कन्फेक्शनरी कारोबार की मांग एक साथ बढ़ती है। इसी समय सप्लाई टाइट हो तो दाम तेज़ी से भागते हैं।
2. पेराई देर से शुरू होना: 2026-27 का चीनी सीज़न 1 अक्टूबर से शुरू हुआ है। उद्योग ने भरोसा दिया था कि कुछ मिलें 15 अक्टूबर से पेराई शुरू कर देंगी, ताकि त्योहार से पहले नई चीनी बाज़ार में आ जाए। लेकिन HT ने एक सरकारी अधिकारी के हवाले से बताया कि महाराष्ट्र और कर्नाटक में कटाई लायक गन्ने की कमी है, कई इलाकों में खड़ा गन्ना सूख गया है, और बड़े पैमाने पर पेराई नवंबर से पहले शुरू होना मुश्किल है। किसान भी नुकसान की भरपाई के बिना जल्दी कटाई को तैयार नहीं हैं, क्योंकि कच्चा गन्ना काटने से रिकवरी (प्रति टन गन्ने से निकलने वाली चीनी) घटती है।
3. कम उत्पादन और मौसम: सरकार ने 21 अगस्त को ही माना था कि उम्मीद से कम घरेलू उत्पादन, मौसम से फसल को नुकसान, मौसमी मांग और संभावित जमाखोरी-सट्टेबाज़ी दाम बढ़ने की वजह हैं। PIB के मुताबिक केंद्र अल नीनो से जुड़ी कम और असमान बारिश के गन्ने पर असर की निगरानी कर रहा है।
4. आयातित चीनी महंगी पड़ना: बिज़नेस स्टैंडर्ड के अनुसार दो रिफाइनरियों को 1 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच 3 लाख टन आयातित चीनी बेचने का कोटा मिला था, लेकिन वे 60,000 टन से भी कम बेच पाईं, क्योंकि घरेलू दाम पर आयातित चीनी बेचना फायदेमंद नहीं था। कृषि विशेषज्ञ जी.के. सूद ने HT से कहा कि देश में पर्याप्त चीनी नहीं है और निर्यात के बजाय घरेलू बाज़ार के लिए दी गई अतिरिक्त 3 लाख टन चीनी सितंबर में ही खप गई।
सरकार ने अब तक क्या कदम उठाए?
- 14 लाख टन का कोटा: खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (DFPD) ने 13 से 31 अक्टूबर के लिए घरेलू मिलों को 14 लाख टन (1.4 मिलियन टन) चीनी बेचने का कोटा तय समय से दो दिन पहले जारी किया। इसके अलावा आयातकों को 2 लाख टन अलग से आवंटित हुआ। मिलों वाले 14 लाख टन में से करीब 83% (11.59 लाख टन) महाराष्ट्र, UP और कर्नाटक को मिला।
- स्टॉक लिमिट सख़्त: 15 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक चीनी डीलर अधिकतम 1,000 क्विंटल स्टॉक ही रख सकेंगे और वह भी अधिकतम 15 दिन के लिए। कोलकाता महानगर क्षेत्र और असम को इससे छूट दी गई है। अगस्त में यह सीमा 4,000 क्विंटल थी, जिसे 15 सितंबर से 2,000 क्विंटल किया गया था।
- बल्क खरीदारों पर रोक: बड़े औद्योगिक खरीदार घरेलू खुले बाज़ार से सिर्फ़ 15 दिन की खपत जितनी चीनी रख सकते हैं; आयातित चीनी से यह 30 दिन तक हो सकती है। उन्हें हर हफ्ते स्टॉक बताना होगा और मिलों के स्टॉक की भौतिक जांच के आदेश हैं (HT)।
- ड्यूटी-फ्री आयात: 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति पहले ही दी जा चुकी है।
व्यापारी क्या कह रहे हैं?
आगरा की खाद्य मंडी मोतीगंज से अमर उजाला की 16 अक्टूबर की रिपोर्ट में व्यापारियों का दावा है कि UP की मिलों से सात दिन से माल नहीं आया और उन्हें महाराष्ट्र से महंगी चीनी मंगानी पड़ रही है। कुछ व्यापारियों का आरोप है कि मिलें घरेलू बाज़ार की बजाय औद्योगिक खरीदारों को सप्लाई दे रही हैं। रोपड़ (पंजाब) में भी हलवाइयों ने बिचौलियों पर ज़्यादा वसूली का आरोप लगाया है; ज़िला खाद्य एवं आपूर्ति नियंत्रक ने मामले की जांच की बात कही है। ध्यान रहे, ये आरोप हैं—मिलों या सरकार की ओर से इनकी पुष्टि नहीं हुई है।
आप पर क्या असर पड़ेगा?
- मिठाई और पेठा महंगे हो सकते हैं: हलवाइयों की लागत का बड़ा हिस्सा चीनी है, इसलिए दिवाली पर मिठाई के दाम बढ़ने की आशंका है।
- घर का बजट: उदाहरण के लिए, अगर आपका परिवार महीने में 5 किलो चीनी खाता है, तो ₹5-6 प्रति किलो बढ़ोतरी का मतलब करीब ₹25-30 अतिरिक्त खर्च है—छोटा लगता है, लेकिन त्योहार में खपत दोगुनी हो जाती है।
- क्या करें: घबराकर बहुत ज़्यादा स्टॉक न खरीदें—इसी से कमी और गहराती है। ज़रूरत भर की खरीद करें, पैकेट पर MRP और वज़न जांचें, और अगर दुकानदार MRP से ज़्यादा वसूले तो राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915 पर शिकायत कर सकते हैं।
आगे क्या?
अगले दो-तीन हफ्ते अहम हैं। अगर 14 लाख टन का कोटा समय पर बाज़ार में पहुंचता है और कुछ मिलें जल्दी पेराई शुरू कर देती हैं, तो दिवाली तक दाम स्थिर हो सकते हैं। लेकिन अगर पेराई नवंबर तक खिंची, तो बाज़ार पुराने स्टॉक और आयातित चीनी पर ही निर्भर रहेगा। दूसरी ओर, गन्ना किसान ज़्यादा भाव और चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP) को ₹31 से बढ़ाकर ₹50 प्रति किलो करने की मांग कर रहे हैं—यह अभी सिर्फ़ मांग है। इन्हीं मुद्दों पर केंद्र ने एक उच्चस्तरीय समिति बनाई है; उसके बारे में हमारी रिपोर्ट रमेश चंद समिति: गन्ना किसानों और चीनी MSP पर पैनल पढ़ें। थोक महंगाई के बड़े रुझान के लिए सितंबर WPI महंगाई रिपोर्ट भी देखें।
स्रोत: हिंदुस्तान टाइम्स, बिज़नेस स्टैंडर्ड, मनीकंट्रोल, PIB (1 अक्टूबर 2026), द ट्रिब्यून, अमर उजाला। दाम शहर और दुकान के हिसाब से अलग हो सकते हैं।

