भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में दो अलग कार्यक्रमों में न्यायपालिका और वकालत के पेशे पर अहम बातें कहीं। इंडिया टुडे (पीटीआई के हवाले से) के अनुसार उन्होंने कहा कि कोई भी फैसला उसे लागू करते समय आने वाली हर व्यावहारिक कठिनाई का अनुमान नहीं लगा सकता। ईटीवी भारत के अनुसार उन्होंने वकीलों के पेशे में नैतिकता पर जोर दिया और कहा कि असहमति और आलोचना वैध हैं, लेकिन उन्हें निष्पक्षता, संयम और संस्थागत गरिमा के सम्मान के साथ रखा जाना चाहिए।
चौथे लॉ एंड कॉन्स्टिट्यूशन डायलॉग में क्या कहा
इंडिया टुडे के अनुसार CJI ने नई दिल्ली के बी.आर. आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में चौथे लॉ एंड कॉन्स्टिट्यूशन डायलॉग का उद्घाटन भाषण दिया। इस दौरान उन्होंने NXT ज्यूडिशियल फोरम, NXT ज्यूडिशियल फेलोशिप और द संडे गार्जियन के “लीगली स्पीकिंग” संस्करण की शुरुआत की। उन्होंने कहा, “एक फैसला विवाद सुलझाता है और कानून घोषित करता है, खुद को निष्कर्ष और उसके कारणों तक सीमित रखते हुए। इसी अनुशासन से फैसले पर दुनिया भर में भरोसा किया जा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह भी है कि फैसला हर उस कठिनाई का अनुमान नहीं लगा सकता जो उसके निर्देश लागू होने पर आएगी।” उन्होंने यह भी कहा, “न्याय सिर्फ इससे मजबूत नहीं होता कि अदालतें क्या फैसला करती हैं, बल्कि इससे भी कि हम उनके काम करने के तरीके पर कितनी खुलकर चर्चा करते हैं।”
रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस कांत ने बताया कि फोरम के उद्देश्यों में मौजूदा न्यायिक सम्मेलनों को अक्सर “जरूरत से ज्यादा औपचारिक या भाषण-प्रधान” बताया गया है। उन्होंने मजाक में कहा कि फोरम ने उनसे सबसे पहले भाषण ही मांगा और वे कोशिश करेंगे कि वह “एग्जिबिट ए” न बन जाए। उन्होंने कहा कि विशिष्ट लोगों को एक शाम एक हॉल में जुटाना आसान है, लेकिन हॉल खाली होने के बाद उनकी बातचीत को “जीवन” देना कठिन है।
लिविंग विल का उदाहरण
इंडिया टुडे के अनुसार CJI ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के 2018 के उस फैसले का जिक्र किया जिसने गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी और लोगों को “लिविंग विल” बनाने की अनुमति दी। उन्होंने बताया कि शुरू में हर ऐसे दस्तावेज पर न्यायिक मजिस्ट्रेट के प्रतिहस्ताक्षर और दो अलग मेडिकल बोर्डों की मंजूरी जरूरी थी। डॉक्टरों को यह प्रक्रिया उस समय बहुत जटिल लगी, जब मरीजों और परिवारों को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। इसलिए 2023 में दिशानिर्देश सरल किए गए, जिनमें नोटरी या राजपत्रित अधिकारी को सत्यापन की अनुमति दी गई और मेडिकल बोर्डों से अधिमानतः 48 घंटे में फैसला करने को कहा गया। उन्होंने कहा कि कैसे अदालत में बनाया गया सुरक्षा उपाय अस्पताल के बिस्तर पर काम करता है, यह सबक ऐसे सवालों पर विचार करने वाली किसी भी अदालत के लिए बहुमूल्य होगा।
अदालतों में एआई पर बात
CJI ने कहा कि हर न्यायपालिका विचार कर रही है कि एआई शोध, अनुवाद और मामलों के शेड्यूल में कितनी मदद कर सकता है, पर किसी के पास इसका व्यापक अनुभव नहीं है। उन्होंने कहा, “चूंकि हम सब एक साथ सीख रहे हैं, इसलिए हर अदालत का अकेले सीखना समझदारी नहीं।”
नैतिकता पर व्याख्यान
ईटीवी भारत के अनुसार “कानूनी पेशे में नैतिकता का महत्व” विषय पर दूसरी मासिक व्याख्यान श्रृंखला में CJI ने कहा कि वकील की सफलता का एक बुनियादी पैमाना यह है कि वह सफलता कैसे हासिल की गई। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था की गरिमा आंशिक रूप से इस पर निर्भर है कि बार के सदस्य अदालत के भीतर और बाहर कैसे व्यवहार करते हैं। उनके अनुसार सलाह में ईमानदारी, प्रतिनिधित्व में परिश्रम, फीस में निष्पक्षता और कमजोर वादियों के प्रति संवेदनशीलता “परिधि के विषय नहीं” बल्कि पेशेवर जिम्मेदारी की जरूरी अभिव्यक्तियां हैं। उन्होंने कहा कि नैतिकता केवल आचरण नियम रटने तक सीमित नहीं हो सकती और शिकायत आने पर ही याद करने की बाध्यता नहीं होनी चाहिए। आपसी भरोसे पर टिकी बेंच-बार के रिश्ते पर उन्होंने कहा कि अदालतें तथ्य रखने और कानून बताने के लिए अधिवक्ताओं पर निर्भर हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
CJI सूर्यकांत ने फैसलों के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि कोई फैसला लागू होते समय आने वाली हर व्यावहारिक कठिनाई का अनुमान नहीं लगा सकता, इसलिए अदालतों को अनुभव साझा करने चाहिए।
उन्होंने लिविंग विल का उदाहरण क्यों दिया?
यह दिखाने के लिए कि 2018 की प्रक्रिया अस्पताल में जटिल साबित हुई और 2023 में सरल की गई।
वकीलों से क्या कहा?
असहमति और आलोचना वैध हैं, पर निष्पक्षता, संयम और संस्थागत गरिमा के सम्मान के साथ।
नोट: उद्धरण 28 अक्टूबर 2026 की मीडिया रिपोर्टों से हैं और हिंदी में भावानुवाद किए गए हैं।

