दवाओं और मेडिकल उपकरणों पर मनमाने मुनाफे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार से दो टूक सवाल किया: सिर्फ कैंसर की दवाएं ही क्यों? जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने साफ कहा कि अदालत सभी दवाओं की बात कर रही है, सिर्फ कैंसर की दवाओं की नहीं।
केंद्र को अब 27 अक्टूबर तक यह बताना है कि दवाओं की कीमतों पर लगाम लगाने के तौर-तरीके (मॉडैलिटीज़) क्या होंगे। इसी दिन मामले की अगली सुनवाई भी है।
केंद्र ने कोर्ट को क्या बताया?
सुनवाई में केंद्र ने अदालत को बताया कि उसने नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30% तक सीमित करने का फैसला किया है। इसमें पेटेंटेड और नॉन-पेटेंटेड, दोनों तरह की दवाएं शामिल हैं।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि DGHS की अध्यक्षता वाली एक विशेषज्ञ समिति ऐसी दवाओं की पहचान करेगी। इसके बाद NPPA उनकी जांच करेगा और फिर कीमतों का नोटिफिकेशन जारी होगा।
हलफनामे में बचत के दावे
केंद्र के हलफनामे के मुताबिक:
- ट्रेड मार्जिन रेशनलाइज़ेशन (TMR) से कैंसर की दवाओं की MRP में 20% से 70% तक कमी आने की उम्मीद है।
- इससे मरीजों को सालाना करीब ₹2,500 करोड़ की बचत हो सकती है।
- 2019 में NPPA ने 42 नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं पर 30% मार्जिन कैप लगाया था, जिससे लगभग ₹984 करोड़ की बचत हुई और 526 ब्रांड्स की MRP घटी।
- DPCO की शेड्यूल-I के तहत 935 फॉर्मूलेशन की सीलिंग प्राइस तय की जा चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट दवा मार्जिन पर सख्त: “बाकी दवाओं का क्या?”
बेंच ने सरकार के कदम को सराहनीय तो माना, लेकिन नाकाफी बताया। अदालत ने पूछा कि DPCO 2013 के तहत रिटेलर के लिए तय 16% मार्जिन जैसी व्यवस्था बाकी दवाओं और मेडिकल डिवाइस तक क्यों नहीं बढ़ाई जा सकती।
बेंच की टिप्पणी काफी तीखी रही। अदालत ने कहा कि यह तो बस हिमशैल का सिरा (टिप ऑफ द आइसबर्ग) है, और यह कदम भी तभी उठा जब कोर्ट ने कड़ी टिप्पणियां कीं। बेंच ने पूछा, “बाकी दवाओं का क्या?” और जोड़ा, “हम सभी दवाओं की बात कर रहे हैं, सिर्फ कैंसर दवाओं की नहीं।” (टिप्पणियां अंग्रेज़ी से अनूदित)
स्टेंट ₹5,000 का, बिका ₹25,000 से ऊपर
अदालत ने कुछ ऐसे उदाहरण सामने रखे जो किसी भी मरीज के परिवार को चौंका दें:
- कार्डियक स्टेंट: भारत में बना स्टेंट, जिसका प्राइस-टू-रिटेलर (PTR) करीब ₹5,000 है, मरीजों को ₹25,000 से ज़्यादा में बेचा गया।
- सलाइन ड्रिप लाइन: जिसकी MRP ₹11 है, वह ₹270 में बेची गई।
इससे पहले भी इस मामले में 1000% तक के मार्कअप का मुद्दा उठ चुका है और इसे “दिनदहाड़े डकैती” तक कहा गया था।
सरकार की दलील: संतुलन ज़रूरी
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि इस मामले में संतुलन बनाना ज़रूरी है। उनका तर्क था कि कम कीमत वाले उत्पादों पर ज़्यादा मार्जिन की ज़रूरत होती है, ताकि वे ग्रामीण इलाकों तक उपलब्ध रहें। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार पूरे इकोसिस्टम को नियंत्रित नहीं करना चाहती।
लेकिन अदालत इस दलील से सहमत नहीं हुई। बेंच ने कहा कि DPCO के तहत आने वाली दवाएं मरीजों तक पहुंचें, यह सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है।
किसकी याचिका पर हो रही है सुनवाई?
यह मामला अधिवक्ता किशन चंद जैन और बाल रोग सर्जन डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की याचिकाओं पर चल रहा है।
ट्रेड मार्जिन आखिर है क्या?
आसान भाषा में, दवा कंपनी से निकलकर मरीज के हाथ तक पहुंचने के बीच डिस्ट्रीब्यूटर, होलसेलर और रिटेलर जो मुनाफा जोड़ते हैं, वही ट्रेड मार्जिन है। नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं वे हैं जो DPCO की तय सूची में नहीं आतीं, इसलिए उन पर सीधी सीलिंग प्राइस लागू नहीं होती। यहीं पर कीमत और असली लागत के बीच बड़ा फासला पैदा हो जाता है।
27 अक्टूबर क्यों अहम?
सुप्रीम कोर्ट दवा मार्जिन मामले में अदालत के रुख से साफ है कि वह कैंसर दवाओं तक सीमित फैसले से संतुष्ट नहीं है। अगर 27 अक्टूबर को केंद्र कोई व्यापक ढांचा पेश करता है, तो इसका असर स्टेंट, ड्रिप लाइन जैसे मेडिकल उत्पादों और आम दवाओं की कीमतों तक दिख सकता है। फिलहाल सबकी नज़र अगली सुनवाई पर है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सुप्रीम कोर्ट ने दवा मार्जिन पर क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ कैंसर दवाओं पर 30% ट्रेड मार्जिन कैप सराहनीय पर नाकाफी है, और पूछा कि बाकी दवाओं व मेडिकल डिवाइस पर ऐसा क्यों नहीं।
केंद्र को कब तक जवाब देना है?
केंद्र को 27 अक्टूबर 2026 तक दवा कीमतों पर कैप के तौर-तरीके तय करने हैं। उसी दिन अगली सुनवाई है।
सुनवाई किस बेंच में हुई?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच में।
कैंसर दवाओं पर 30% कैप से कितनी बचत का अनुमान है?
केंद्र के हलफनामे के अनुसार MRP में 20-70% कमी और मरीजों को सालाना करीब ₹2,500 करोड़ की बचत का अनुमान है।

