रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले भारत के लिए शनिवार, 17 अक्टूबर 2026 की सुबह एक बड़ी राहत वाली खबर लेकर आई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार (16 अक्टूबर, अमेरिकी समय) की शाम एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) पर दस्तखत कर “लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026” के तहत लगने वाले टैरिफ और ज़्यादातर प्रतिबंधों को फिलहाल लागू होने से रोक दिया। इसी कानून के तहत रूसी तेल और गैस के पांच सबसे बड़े खरीदार देशों से अमेरिका आने वाले सामान पर 100% अतिरिक्त शुल्क लग सकता था, और भारत इन देशों में शामिल माना जा रहा था।
यह फैसला ठीक उस वक्त आया है जब शुल्क लगने की समय-सीमा, यानी रविवार 18 अक्टूबर, सिर पर थी और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत दौरे पर निकल रहे हैं। इस खबर में हम आसान भाषा में समझा रहे हैं कि आदेश में असल में क्या लिखा है, भारत को इससे क्या मिला, कौन-सी बातें अभी भी खुली हैं और आम लोगों, निर्यातकों और बाज़ार पर इसका क्या असर पड़ सकता है।
ग्राहम एक्ट क्या है और भारत क्यों चिंता में था
व्हाइट हाउस के आदेश के मुताबिक ट्रंप ने 18 सितंबर 2026 को इस कानून पर दस्तखत किए थे। यह कानून मुख्य रूप से रूस की तेल-गैस से होने वाली कमाई पर चोट करने के लिए बनाया गया था, ताकि यूक्रेन युद्ध के लिए उसके पास पैसा कम पहुंचे। CBS News के अनुसार इसके मुख्य पैरोकार दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम थे और कानून का निशाना खास तौर पर रूसी तेल-गैस के सबसे बड़े खरीदार, जैसे चीन, भारत और तुर्की थे।
IANS और Times of India के मुताबिक कानून में प्रावधान था कि लागू होने के 30 दिन के भीतर रूसी कच्चे तेल या गैस के पांच सबसे बड़े आयातक देशों के सामान पर 100% तक शुल्क लगाया जाए। यह 30 दिन की मियाद रविवार, 18 अक्टूबर को पूरी हो रही थी।
भारत ने इस कानून पर पहले ही आपत्ति जताई थी। 17 सितंबर को विदेश मंत्रालय (MEA) ने बयान जारी कर कहा था कि भारत अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और यह काम “विविध स्रोतों” से और बाज़ार की बदलती परिस्थितियों के आधार पर करता रहेगा। मंत्रालय ने यह भी कहा था कि भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए “सभी ज़रूरी कदम” उठाएगा। अगले दिन MEA प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया था कि अमेरिकी प्रशासन को वरिष्ठ स्तर पर बता दिया गया है कि इस कानून का असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार और “पूरे रिश्ते” पर पड़ सकता है।
ट्रंप के आदेश में असल में क्या है
व्हाइट हाउस की वेबसाइट पर जारी आदेश दो हिस्सों में काम करता है। पहले हिस्से (सेक्शन 2) में कानून के मुताबिक शुल्क तय किए गए हैं, और दूसरे हिस्से (सेक्शन 4) में उन्हीं को तुरंत छूट (waiver) देकर रोक दिया गया है। मुख्य बातें:
- रूस के सामान पर 500% शुल्क का प्रावधान रखा गया, लेकिन उसे छूट दे दी गई।
- रूसी तेल-गैस के 5 सबसे बड़े आयातक देशों पर 100% शुल्क का प्रावधान है, अगर वे 18 अक्टूबर 2026 या उसके बाद जानबूझकर नई खरीद करते हैं। यह भी फिलहाल छूट के दायरे में है।
- प्रतिबंधों से बचने में रूस की मदद करने वाले 5 शीर्ष देशों पर भी 100% शुल्क का प्रावधान है, और इसे भी रोका गया है।
- कानून की धारा 112 और 113 के तहत सभी शुल्कों पर छूट दी गई है। साथ ही धारा 102(a), 102(d), 102(e), 103 से 111 और 117 के तहत लगने वाले ज़्यादातर प्रतिबंध भी रोक दिए गए हैं।
- ट्रंप ने लिखा है कि उन्होंने अमेरिकी संसद (कांग्रेस) को लिखित प्रमाणपत्र भेजा है कि यह छूट “अमेरिका के राष्ट्रीय हित” में है। IANS के अनुसार यह प्रमाणपत्र और उसके साथ भेजी गई रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है।
आदेश में किसी देश का नाम नहीं लिया गया है। यह भी साफ लिखा गया है कि रूस पर पहले से लागू दूसरे अमेरिकी प्रतिबंध (जो अलग कार्यकारी आदेशों के तहत हैं) इससे प्रभावित नहीं होंगे।
राहत पक्की है या अस्थायी?
यह इस खबर का सबसे अहम पहलू है। आदेश के मुताबिक छूट तब तक लागू रहेगी जब तक राष्ट्रपति या विदेश मंत्री, ट्रेज़री और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) से सलाह करके यह तय न करें कि “आगे की कार्रवाई उचित है”। यानी इसकी कोई तय समाप्ति तारीख नहीं है, लेकिन इसे कभी भी वापस भी लिया जा सकता है।
आदेश USTR को यह ज़िम्मेदारी भी देता है कि वह रूसी तेल-गैस खरीदने वाले देशों पर नज़र रखे, राष्ट्रपति को नियमित रिपोर्ट दे और ऐसी किसी भी स्थिति की तुरंत जानकारी दे जिसमें “आगे कार्रवाई की ज़रूरत” दिखे, जिसमें छूट पर दोबारा विचार भी शामिल है। USTR को यह भी बताना है कि प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले शीर्ष 5 देश कौन हैं। इसलिए भारत के लिए यह फिलहाल की राहत है, स्थायी गारंटी नहीं।
ट्रंप ने ऐसा क्यों किया
अमेरिकी मीडिया के मुताबिक इसके पीछे सबसे बड़ी वजह वहां ईंधन की ऊंची कीमतें हैं। Times of India के अनुसार अमेरिका में डीज़ल सितंबर में 6.52 डॉलर प्रति गैलन के रिकॉर्ड स्तर तक गया था और शुक्रवार को करीब 6.28 डॉलर पर था। 3 नवंबर को वहां मध्यावधि (मिडटर्म) चुनाव हैं, इसलिए ईंधन की कीमत राजनीतिक मुद्दा बन गई है।
CBS News ने बताया कि यह छूट ट्रंप के उस फैसले के एक हफ्ते बाद आई है, जिसमें उन्होंने रूसी डीज़ल पर प्रतिबंधों में ढील दी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ डीज़ल सप्लाई का समझौता घोषित किया। CNBC के मुताबिक ट्रंप ने लिखा था कि रूस तुरंत 3 लाख टन से ज़्यादा डीज़ल देगा, फिर नवंबर में 5 लाख टन और उसके बाद और खेप भेजी जाएंगी। अमेरिकी ट्रेज़री ने इसके लिए 7 अप्रैल तक का अस्थायी जनरल लाइसेंस जारी किया था।
इस फैसले का अमेरिका के भीतर विरोध भी हो रहा है। CBS के अनुसार दोनों दलों के कुछ सीनेटरों ने डीज़ल छूट को “यूक्रेन के लोगों के साथ विश्वासघात” बताया था। IANS के मुताबिक रिपब्लिकन सांसद माइकल मैककॉल और डेमोक्रेट सांसद जिम कोस्टा ने गुरुवार को पत्र लिखकर मांग की थी कि कोई भी छूट “सीमित, समयबद्ध” हो और रूस की युद्ध में मदद घटाने से जुड़ी हो। शुक्रवार के आदेश में दी गई छूट की कोई समय-सीमा नहीं है।
भारत के लिए इसका मतलब: 5 बड़ी बातें
- रूसी तेल की खरीद जारी रह सकती है: Times of India के मुताबिक रूस इस समय भी भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर है। होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाज़ों पर हमलों के बीच मध्य-पूर्व से सप्लाई प्रभावित है, इसलिए रूसी तेल भारत के लिए अहम विकल्प बना हुआ है। शुल्क टलने से यह खरीद बिना नए आर्थिक दंड के जारी रह सकती है।
- निर्यातकों पर बड़ा खतरा टला: अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में भारत ने अमेरिका को करीब 86.5 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया था। अगर उस पर 100% अतिरिक्त शुल्क लगता, तो कपड़ा, इंजीनियरिंग सामान, रत्न-आभूषण जैसे क्षेत्रों के लिए अमेरिकी बाज़ार में टिकना बहुत मुश्किल हो जाता।
- पुराना अनुभव: IANS और TOI के अनुसार पिछले साल अमेरिका ने रूसी तेल खरीद के कारण भारत पर 25% का अतिरिक्त “पेनल्टी” शुल्क लगाया था, जिससे कुल शुल्क 50% हो गया था। फरवरी 2026 में एक व्यापार ढांचे के तहत यह अतिरिक्त शुल्क हटाया गया और भारतीय सामान पर पारस्परिक शुल्क 25% से घटाकर 18% किया गया। इसलिए 100% शुल्क की आशंका भारतीय उद्योग के लिए बड़ी चिंता थी।
- ट्रेड डील पर असर: TOI ने लिखा है कि प्रतिबंध कानून को भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर भारी माना जा रहा था और अब छूट के बाद उस मोर्चे पर भी हलचल दिख सकती है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने हाल में संकेत दिया था कि समझौते का मसौदा लगभग तैयार है। IANS के मुताबिक दोनों देश व्यापार समझौते की पहली किस्त को अंतिम रूप देने के करीब हैं।
- चुनौती अभी बाकी: TOI ने Reuters के हवाले से बताया कि भारतीय रिफाइनर अक्टूबर-नवंबर में रूसी तेल की सप्लाई तंग रहने की उम्मीद कर रहे हैं, क्योंकि चीन ऊंची कीमत देकर पहले से कार्गो बुक कर रहा है। यानी शुल्क का खतरा टलने के बावजूद रूसी तेल के लिए चीन से मुकाबला जारी रहेगा।
भारत को पहले से अंदाज़ा था?
The New Indian Express ने गुरुवार (15 अक्टूबर) को सरकारी सूत्रों के हवाले से लिखा था कि भारत को उम्मीद है कि अमेरिका इस कानून के तहत भारत पर दंडात्मक शुल्क नहीं लगाएगा, और भारत अपना पक्ष वॉशिंगटन तक पहुंचा चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने इससे एक दिन पहले कहा था कि ट्रंप जल्द इस पर फैसला करेंगे और भारत के प्रति “व्यावहारिक” रुख अपनाया जा सकता है। भारतीय अधिकारियों ने यह भी याद दिलाया था कि रूस से S-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने पर भी भारत अमेरिकी CAATSA प्रतिबंधों से बच गया था।
शनिवार सुबह तक भारत सरकार की ओर से इस आदेश पर कोई नई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।
आप पर क्या असर पड़ेगा
पेट्रोल-डीज़ल: इस फैसले से पेट्रोल-डीज़ल के दाम तुरंत कम होने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ब्रेंट कच्चा तेल शुक्रवार को लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था और तेल कंपनियों पर पहले से घाटे का दबाव है, जिसके बारे में आप हमारी कच्चा तेल 110 डॉलर और बाज़ार पर असर वाली रिपोर्ट में पढ़ सकते हैं। लेकिन इतना ज़रूर है कि अगर रूसी तेल पर रोक लगती तो सप्लाई और महंगी हो सकती थी। वह खतरा फिलहाल टल गया है।
नौकरी और कारोबार: अमेरिका को निर्यात करने वाले कारखानों, खासकर कपड़ा और इंजीनियरिंग जैसे उद्योगों में काम करने वालों के लिए यह अच्छी खबर है, क्योंकि 100% शुल्क से ऑर्डर घटने का डर था। निर्यात से जुड़े दूसरे सरकारी फैसलों के लिए हमारी पेट्रोल-डीज़ल निर्यात पर विंडफॉल टैक्स रिपोर्ट भी देखें।
शेयर बाज़ार: सोमवार 19 अक्टूबर को बाज़ार खुलने पर निर्यात से जुड़े सेक्टर और रिफाइनिंग कंपनियों पर निवेशकों की नज़र रहेगी। यह जानकारी किसी शेयर को खरीदने या बेचने की सलाह नहीं है; निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से बात करें।
आगे क्या: रुबियो का भारत दौरा अहम
IANS के मुताबिक अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो 17 से 22 अक्टूबर तक समरकंद, मुंबई और जामनगर की यात्रा पर हैं। 20 अक्टूबर को मुंबई में उनकी विदेश मंत्री एस. जयशंकर से बातचीत तय है और वे जामनगर के रिफाइनरी परिसर का दौरा भी करेंगे, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनरी परिसर माना जाता है। रुबियो के दौरे की पृष्ठभूमि हमारी मार्को रुबियो भारत दौरा रिपोर्ट में है। माना जा रहा है कि इस मुलाकात में ऊर्जा, व्यापार समझौता और रूसी तेल का मुद्दा चर्चा में रह सकता है।
आने वाले हफ्तों में तीन बातों पर नज़र रखनी होगी: पहली, USTR की निगरानी रिपोर्ट में भारत का ज़िक्र किस तरह होता है; दूसरी, अमेरिकी संसद में छूट के विरोध का क्या नतीजा निकलता है; और तीसरी, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की पहली किस्त कब तक फाइनल होती है। छूट खुली मियाद की है, इसलिए नीति में बदलाव की गुंजाइश बनी रहेगी। TrendFlash इस खबर से जुड़े हर आधिकारिक अपडेट पर नज़र रखेगा।
स्रोत: व्हाइट हाउस का कार्यकारी आदेश “Implementing the Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026” (16 अक्टूबर 2026), CBS News (16 अक्टूबर), Times of India (17 अक्टूबर), IANS (17 अक्टूबर), The New Indian Express (17 अक्टूबर), CNBC (9 अक्टूबर), विदेश मंत्रालय के बयान (17-18 सितंबर 2026, Jagran English में उद्धृत), The Hindu। निर्यात आंकड़ा: वाणिज्य मंत्रालय (2024-25)।

