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7 नवम्बर 2026, शनि

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को कहा कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून प्रेस की आजादी पर अंकुश नहीं लगाता। उन्होंने संपादकों और मीडिया पेशेवरों को सरकार के साथ बातचीत के लिए आमंत्रित भी किया। यह बयान ऐसे समय आया है जब समाचार प्रकाशकों के संगठन ने इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। पीटीआई की रिपोर्ट पर आधारित हिंदू बिजनेसलाइन और बिजनेस स्टैंडर्ड के आधार पर पूरा मामला यहां है।

वैष्णव ने क्या कहा

पीटीआई के हवाले से वैष्णव ने कहा, “पत्रकारीय स्वतंत्रता भारत के संविधान द्वारा गारंटीकृत है। वह स्वतंत्रता पूरी तरह उपलब्ध है। उसे प्रभावित करने की मंशा तक नहीं है।” उन्होंने कहा कि निजता कानून पत्रकारीय आजादी को पूरी तरह बनाए रखता है। मंत्री के अनुसार DPDP कानून सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का नतीजा है जिसमें निजता को मौलिक अधिकार माना गया और इसे एक साल से ज्यादा चले परामर्श के बाद बनाया गया, जिसमें अखबार, टीवी चैनल, मीडिया प्रतिनिधि और आईटी उद्योग शामिल थे।

प्रकाशकों की आपत्ति क्या है

बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार एक दिन पहले डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA), जो 21 समाचार प्रकाशकों का प्रतिनिधित्व करता है, ने कानून और उसके नियमों के प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उसका तर्क है कि पत्रकारीय गतिविधियों के लिए स्पष्ट छूट न होने से खोजी रिपोर्टिंग में दिक्कत आ सकती है। हिंदू बिजनेसलाइन के अनुसार प्रकाशकों की चिंता नोटिस, सहमति और व्यक्तिगत डेटा की प्रोसेसिंग से जुड़ी शर्तों, जांच के लिए जरूरी जानकारी रखने और गोपनीय स्रोतों की सुरक्षा को लेकर है। खासकर तब, जब पत्रकार जनहित के मामलों में संबंधित व्यक्तियों की सहमति के बिना जानकारी जुटाते हैं। डेटा मिटाने की शर्तें भी इसी चिंता का हिस्सा बताई गईं।

क्या कानून में संशोधन संभव है

हिंदू बिजनेसलाइन के अनुसार सूत्रों ने संकेत दिया कि सरकार पत्रकारीय गतिविधियों को स्पष्ट रूप से सुरक्षित करने के लिए कानून में संशोधन के लिए खुली है। एक शीर्ष सूत्र ने कहा, “अगर इसे कानून में साफ लिखने की जरूरत है तो लिख सकते हैं; इसके लिए बस संशोधन चाहिए।” उन्होंने कहा कि सरकार की मंशा साफ है और वह बैठकर चर्चा करने को तैयार है। यह बात आधिकारिक घोषणा नहीं, सूत्रों के हवाले से कही गई है, इसलिए इसे अंतिम फैसला न समझें।

सुप्रीम कोर्ट में मामला

बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होनी है।

पाठकों के लिए क्या मायने

DPDP कानून डिजिटल निजी डेटा के इस्तेमाल को नियंत्रित करता है। विवाद का सार यह है कि क्या खबर जुटाने के दौरान किसी व्यक्ति के बारे में बिना सहमति जानकारी का उपयोग भी इसके दायरे में आएगा और क्या पत्रकारों के लिए अलग छूट जरूरी है। सरकार का कहना है कि संविधान का प्रेस स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोपरि है, जबकि प्रकाशक चाहते हैं कि यह बात कानून में स्पष्ट रूप से लिखी जाए। अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और सरकार-मीडिया संवाद पर हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

DPDP कानून पर विवाद क्या है?

समाचार प्रकाशकों का कहना है कि पत्रकारीय गतिविधियों के लिए स्पष्ट छूट न होने से खोजी पत्रकारिता और गोपनीय स्रोतों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

सरकार का क्या कहना है?

अश्विनी वैष्णव के अनुसार कानून प्रेस की आजादी का उल्लंघन नहीं करता और संविधान उसकी गारंटी देता है। सूत्रों के मुताबिक जरूरत पड़ने पर संशोधन संभव है।

अगली सुनवाई कब है?

बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 17 नवंबर को है।

नोट: यह जानकारी 28 अक्टूबर 2026 तक की रिपोर्टों पर आधारित है। संशोधन पर सरकार का कोई औपचारिक फैसला अभी सामने नहीं आया है।

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