क्या 18 साल का होते ही बेटा माता-पिता से खर्च मांगने का हक खो देता है? सुलतानपुर (उत्तर प्रदेश) की फैमिली कोर्ट के ताज़ा आदेश ने यह सवाल फिर चर्चा में ला दिया है। अदालत ने कहा कि बालिग बेटा गुजारा भत्ता के लिए अर्ज़ी दे सकता है—सिर्फ वयस्क होने के आधार पर याचिका खारिज नहीं होगी। पर भत्ता तभी मिलेगा, जब बेटा कानून में तय आधारों पर अपनी असमर्थता साबित करे।
मामला क्या है?
अधिवक्ता प्रदीप सिंह के मुताबिक केस अमेठी ज़िले के एक परिवार का है। पति-पत्नी के बीच 2006 में पारिवारिक मुकदमा हुआ, फिर दोनों ने अलग-अलग शादी कर ली। उनके वयस्क बेटे ने 2025 में पिता से भरण-पोषण के लिए याचिका दाखिल की।
पिता की दलीलें
- 2006 के समझौते में तय हुआ था कि बेटा एक साल मां के पास रहकर पिता के संरक्षण में जाएगा और पिता से भरण-पोषण नहीं मांगेगा।
- वे पहले बेटे का खर्च उठाते रहे हैं।
- बेटा अब पढ़ा-लिखा है और ऑनलाइन फॉर्म भरने की दुकान चलाता है, इसलिए अपना खर्च खुद उठा सकता है।
कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायाधीश निशा सिंह ने पिता की यह आपत्ति खारिज कर दी कि बालिग होने के बाद बेटा भरण-पोषण नहीं मांग सकता, और याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली। साथ ही साफ किया कि याचिका स्वीकार होने का मतलब भत्ता मंज़ूर होना नहीं है।
कानून क्या कहता है: BNSS की धारा 144
1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144, पुरानी CrPC की धारा 125 की जगह आई है। पर्याप्त साधन वाला व्यक्ति अगर इनकी उपेक्षा करे, तो मजिस्ट्रेट उसे हर महीने भत्ता देने का आदेश दे सकता है:
- धारा 144(1)(b): वैध या अवैध संतान, विवाहित हो या नहीं, जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो।
- धारा 144(1)(c): बालिग वैध या अवैध संतान (विवाहित बेटी को छोड़कर), जो किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या चोट के कारण अपना भरण-पोषण नहीं कर सकती।
- धारा 144(1)(d): पिता या माता, जो अपना भरण-पोषण न कर सकें।
‘नाबालिग’ शब्द का पेच
यहीं वह बारीकी है जिस पर बहस हो रही है। पुरानी CrPC की धारा 125(1)(b) में “नाबालिग संतान” लिखा था, जबकि BNSS की धारा 144(1)(b) में बस “संतान” लिखा है। कुछ जानकार मानते हैं कि इससे पढ़ाई कर रही या बेरोज़गार बालिग संतान के लिए भी रास्ता खुल सकता है। लेकिन अदालतें इस बदलाव को कैसे पढ़ती हैं, यह अभी तय हो रहा है। इसलिए सिर्फ बेरोज़गार या बालिग होना अपने आप भत्ते की गारंटी नहीं है।
आप पर क्या असर पड़ेगा
- बालिग संतान के लिए: पढ़ाई, बीमारी, चोट या विकलांगता के कारण कमा नहीं पा रहे, तो अर्ज़ी दे सकते हैं—पर आय, पढ़ाई या मेडिकल रिपोर्ट जैसे सबूत देने होंगे।
- माता-पिता के लिए: सिर्फ “बच्चा बालिग हो गया” कहना हर बार काफी नहीं होगा; बच्चे की असली कमाई और हालात अहम होंगे।
- पुराने समझौते: 2006 के समझौते के हवाले के बावजूद कोर्ट ने याचिका सुनी—यानी पुराना समझौता अपने आप सुनवाई का रास्ता बंद नहीं करता।
- अंतरिम राहत: धारा 144 में सुनवाई के दौरान अंतरिम भरण-पोषण का प्रावधान भी है, और कानून कहता है कि ऐसी अर्ज़ी का निपटारा जहाँ तक संभव हो, नोटिस मिलने के 60 दिन के भीतर हो।
किसी भी केस में कदम उठाने से पहले किसी वकील या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) से सलाह ज़रूर लें। DLSA पात्र लोगों को मुफ्त कानूनी मदद भी देता है।
आगे क्या
अब आगे की सुनवाई में बेटे को अपनी असमर्थता साबित करनी होगी, जबकि पिता उसकी कमाई के सबूत रखेंगे। BNSS में “नाबालिग” शब्द हटने का असली असर ऊंची अदालतों के फैसलों से ही पूरी तरह साफ होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
क्या बालिग बेटा पिता से गुजारा भत्ता मांग सकता है?
अर्ज़ी दे सकता है। सुलतानपुर कोर्ट के मुताबिक सिर्फ बालिग होने पर याचिका खारिज नहीं होगी, पर असमर्थता साबित करनी होगी।
क्या कोर्ट ने बेटे को भत्ता दे दिया है?
नहीं। कोर्ट ने सिर्फ याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार की है। भत्ता मिलेगा या नहीं, यह आगे की सुनवाई में तय होगा।
भरण-पोषण का कानून कौन-सा है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 144, जो पुरानी CrPC की धारा 125 की जगह आई है।
किस बालिग संतान को साफ तौर पर भत्ते का हक है?
धारा 144(1)(c) के तहत वह बालिग संतान (विवाहित बेटी को छोड़कर), जो शारीरिक या मानसिक असामान्यता या चोट के कारण अपना भरण-पोषण नहीं कर सकती।
स्रोत: लाइव हिन्दुस्तान, ABP न्यूज़, संदेश वाहक (13 अक्टूबर 2026); भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144 का पाठ।

