केंद्रीय कैबिनेट ने 28 अक्टूबर 2026 को खेलो इंडिया स्पोर्ट्स गुड्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम को हरी झंडी दी। PIB की कैबिनेट ब्रीफिंग के मुताबिक आठ साल, यानी वित्त वर्ष 2026-27 से 2033-34 तक चलने वाली इस योजना का कुल खर्च ₹1,856 करोड़ है। मकसद भारत को उच्च गुणवत्ता वाले खेल सामान का वैश्विक केंद्र बनाना है। यहां पूरी योजना आसान भाषा में समझिए।
योजना का मकसद क्या है?
सरकार के अनुसार योजना का लक्ष्य अच्छे खेल सामान को सस्ता और सुलभ बनाना, हर उम्र के लोगों में खेलों की भागीदारी बढ़ाना, मेक इन इंडिया को मजबूती देना और विश्वस्तरीय खेल आयोजनों की मेजबानी के लिए देश को तैयार करना है। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार योजना के दो हिस्से हैं: एक, विनिर्माण को प्रोत्साहन देने वाला और दूसरा, पूरे इकोसिस्टम को मजबूत करने वाले हस्तक्षेप।
विनिर्माण के लिए प्रोत्साहन
चार स्पोर्ट्स गुड्स मैन्युफैक्चरिंग जोन
योजना के तहत 300 एकड़ से अधिक क्षेत्र वाले चार एकीकृत स्पोर्ट्स गुड्स मैन्युफैक्चरिंग जोन बनाए जाएंगे। ये जोन DPIIT की BHAVYA योजना और NICDC पार्कों के साथ तालमेल में विकसित होंगे।
एंकर निवेशकों को मदद
कम से कम ₹100 करोड़ का निवेश करने वाले एंकर निवेशकों को 20 प्रतिशत पूंजीगत खर्च (कैपेक्स) सहायता मिलेगी।
टर्नओवर आधारित प्रोत्साहन
₹10 करोड़ या उससे ज्यादा निवेश करने वाले निर्माताओं को 15 प्रतिशत तक टर्नओवर-लिंक्ड प्रोत्साहन मिलेगा। यानी जितनी बिक्री होगी, उसी हिसाब से मदद बढ़ेगी।
मौजूदा क्लस्टरों का उन्नयन
जो खेल सामान क्लस्टर पहले से चल रहे हैं, उनकी साझा सुविधाओं को राज्यों के साथ लागत साझा करके बेहतर बनाया जाएगा।
इकोसिस्टम मजबूत करने वाले कदम
- सर्टिफिकेशन और टेस्टिंग: पहली बार प्रमाणन की 70 प्रतिशत लागत और नवीनीकरण की 50 प्रतिशत लागत योजना उठाएगी।
- शोध और कौशल: उत्कृष्टता केंद्रों, शोध के सह-वित्तपोषण और स्किलिंग को ANRF तथा कौशल विकास मंत्रालय के साथ मिलकर सहयोग मिलेगा।
- स्टार्टअप: DPIIT में पंजीकृत स्पोर्ट्स स्टार्टअप को ₹20 लाख तक का अनुदान मिल सकता है।
- ब्रांडिंग और प्रचार: इंडिया स्पोर्ट्स एक्सपो और ब्रांड इंडिया अभियान चलाकर भारतीय खेल सामान को दुनिया के बाजारों तक पहुंचाया जाएगा।
इस फैसले का मतलब क्या है?
योजना में मौजूदा क्लस्टरों को उन्नत करने का प्रावधान उन निर्माताओं को सहारा देने की दिशा में है जो पहले से खेल सामान बना रहे हैं। जब पहली बार प्रमाणन की 70 प्रतिशत लागत सरकार उठाएगी, तो छोटे निर्माताओं के लिए गुणवत्ता के मानकों पर खरा उतरना आसान हो सकता है। टेस्टिंग की साझा सुविधाएं भी हर इकाई का अलग खर्च घटा सकती हैं।
जानकारों की नजर इस पर रहेगी कि चार बड़े जोन कहां बनते हैं और निजी निवेशक कितनी दिलचस्पी दिखाते हैं। फिलहाल सरकार ने जोन के स्थानों की घोषणा नहीं की है। जिन जानकारियों की पुष्टि PIB की ब्रीफिंग में नहीं है, उन पर हम कोई अनुमान नहीं लगा रहे।
योजना एक नजर में
- कुल खर्च: ₹1,856 करोड़
- अवधि: वित्त वर्ष 2026-27 से 2033-34 (आठ साल)
- चार जोन: प्रत्येक 300 एकड़ से अधिक
- एंकर निवेश: कम से कम ₹100 करोड़ पर 20% कैपेक्स सहायता
- टर्नओवर प्रोत्साहन: ₹10 करोड़ या अधिक निवेश पर 15% तक
- स्टार्टअप अनुदान: ₹20 लाख तक
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
खेलो इंडिया स्पोर्ट्स गुड्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम कितने साल चलेगी?
यह आठ साल, यानी वित्त वर्ष 2026-27 से 2033-34 तक चलेगी।
स्कीम का कुल बजट कितना है?
कैबिनेट ने इसके लिए ₹1,856 करोड़ मंजूर किए हैं।
क्या खिलाड़ियों को सीधे पैसा मिलेगा?
नहीं। यह निर्माताओं, क्लस्टरों, स्टार्टअप और इकोसिस्टम के लिए है, ताकि खेल सामान की गुणवत्ता बढ़े और कीमत घटे।
स्पोर्ट्स स्टार्टअप को कितनी मदद मिलेगी?
DPIIT-पंजीकृत स्पोर्ट्स स्टार्टअप को ₹20 लाख तक का अनुदान मिल सकता है।
नोट: जानकारी PIB की 28 अक्टूबर 2026 की कैबिनेट ब्रीफिंग और इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट पर आधारित है।

