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6 नवम्बर 2026, शुक्र

उत्तराखंड के नीचे 115 किमी तक ‘लॉक’ है हिमालयी फॉल्ट: नई स्टडी में हर 100 साल में 8.1 तीव्रता जितनी ऊर्जा जमा होने का आकलन; क्या यह भूकंप की भविष्यवाणी है?

उत्तराखंड के औली से दिखती गढ़वाल हिमालय की बर्फीली चोटियां और रोपवे टावर

उत्तराखंड के पहाड़ ऊपर से जितने शांत दिखते हैं, जमीन के नीचे उतनी ही बड़ी ऊर्जा जमा हो रही है। एक नई वैज्ञानिक स्टडी के मुताबिक उत्तराखंड के नीचे से गुजरने वाला हिमालय का सबसे बड़ा फॉल्ट, यानी मेन हिमालयन थ्रस्ट (MHT), करीब 115 किलोमीटर की चौड़ाई में पूरी तरह ‘लॉक’ यानी फंसा हुआ है। शोधकर्ताओं का आकलन है कि इस हिस्से में जितनी तनाव-ऊर्जा जमा हो रही है, वह हर 100 साल में 8.1 तीव्रता के एक बड़े भूकंप के बराबर है। यह खबर इस समय गूगल ट्रेंड्स इंडिया पर तेजी से सर्च हो रही है। लेकिन घबराने से पहले यह समझना जरूरी है कि स्टडी असल में क्या कहती है और क्या नहीं कहती।

किसने की स्टडी और कहां छपी

यह रिसर्च अंतरराष्ट्रीय जर्नल Earth and Planetary Science Letters में 4 अक्टूबर 2026 को ऑनलाइन प्रकाशित हुई है। इसके लेखक हैं सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ तमिलनाडु के भूविज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. दिब्यशक्ति पांडा (मुख्य लेखक), आईआईटी बॉम्बे के मृदुल यादव और जी. श्रीनिवास राव, और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिको के एरिक ओ. लिंडसे। इसी शोध के शुरुआती नतीजे मई 2026 में वियना में हुई यूरोपियन जियोसाइंसेज यूनियन (EGU) की आम सभा में भी रखे गए थे। पिछले दो दिनों में इंडिया टुडे, आजतक और टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे संस्थानों ने इस पर विस्तार से रिपोर्ट की है, जिसके बाद यह विषय चर्चा में आया।

स्टडी के मुख्य आंकड़े

  • 18 मिमी प्रति वर्ष का ‘स्लिप डेफिसिट’: भारतीय प्लेट जितनी तेजी से यूरेशियाई प्लेट की ओर बढ़ रही है, उसका बड़ा हिस्सा फॉल्ट पर फिसलकर निकल नहीं रहा, बल्कि चट्टानों में तनाव के रूप में जमा हो रहा है। यह अंतर करीब 18 मिलीमीटर सालाना है।
  • 115 किमी चौड़ाई में लॉक: GNSS (GPS जैसे सैटेलाइट पोजिशनिंग स्टेशन) के आंकड़ों से पता चला कि फॉल्ट सतह से करीब 20 किलोमीटर गहराई तक, लगभग 115 किमी चौड़ाई में कसकर जुड़ा है।
  • हर साल 4-6 मिमी उठान: जापान के ALOS-2 रडार सैटेलाइट की 2015 से 2024 तक की तस्वीरों के विश्लेषण में इलाके की जमीन हर साल 4 से 6 मिलीमीटर तक ऊपर उठती दिखी।
  • कपलिंग 0.8 से ज्यादा: यानी प्लेटों की 80 फीसदी से ज्यादा हलचल फॉल्ट पर अटकी हुई है। करीब 300 किलोमीटर लंबे इस हिस्से में जमा ऊर्जा को शोधकर्ताओं ने हर सदी में एक Mw 8.1 भूकंप के बराबर आंका है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार स्टडी में यह भी पाया गया कि दिल्ली-हरिद्वार के नीचे मौजूद भूगर्भीय उभार (Delhi-Haridwar ridge) फॉल्ट की इस जकड़न को कम नहीं कर रहा। पहले कुछ वैज्ञानिक मानते थे कि उत्तराखंड वाला हिस्सा ‘कमजोर कपलिंग’ वाला है, जहां ऊर्जा धीरे-धीरे निकल जाती है। नई स्टडी ने इस धारणा को चुनौती दी है।

क्या यह भूकंप की भविष्यवाणी है? नहीं

यह सबसे अहम बात है। खुद शोधकर्ताओं ने साफ कहा है कि यह इस बात की भविष्यवाणी नहीं है कि हर 100 साल में 8.1 तीव्रता का भूकंप आएगा, और न ही इससे यह पता चलता है कि अगला बड़ा भूकंप कब आएगा। यह सिर्फ यह बताने का तरीका है कि फॉल्ट पर ऊर्जा किस रफ्तार से जमा हो रही है। भविष्य के भूकंप का समय, तीव्रता और दरार की लंबाई इस गणना से तय नहीं की जा सकती। सोशल मीडिया पर ‘8.1 का महाभूकंप आने वाला है’ जैसे दावे इसलिए भ्रामक हैं।

पृष्ठभूमि: ‘सेंट्रल हिमालयन सिस्मिक गैप’ क्यों चिंता का विषय

भारतीय प्लेट हर साल कुछ सेंटीमीटर उत्तर की ओर खिसकते हुए यूरेशियाई प्लेट के नीचे धंस रही है। इसी टक्कर से हिमालय बना और इसी वजह से यहां भूकंप आते हैं। उत्तराखंड जिस हिस्से में आता है, उसे वैज्ञानिक ‘सेंट्रल हिमालयन सिस्मिक गैप’ कहते हैं, क्योंकि यहां मेगाथ्रस्ट के बड़े हिस्से में पिछले 200 से ज्यादा सालों से कोई बहुत बड़ा, फॉल्ट को सतह तक तोड़ने वाला भूकंप दर्ज नहीं हुआ है। राज्य ने 1991 में उत्तरकाशी और 1999 में चमोली जैसे विनाशकारी भूकंप जरूर झेले हैं, लेकिन ये 7 से कम तीव्रता के भूकंप थे, जबकि सिस्मिक गैप की चिंता उससे कहीं बड़े, मेगाथ्रस्ट को तोड़ने वाले भूकंप को लेकर है। पड़ोसी नेपाल में 2015 का गोरखा भूकंप भी इसी हिमालयी फॉल्ट सिस्टम से जुड़ा था।

आप पर क्या असर पड़ेगा

स्टडी की चेतावनी सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं है। शोधकर्ताओं के मुताबिक हिमालय से सटे सिंधु-गंगा के मैदान दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले इलाकों में हैं। दिल्ली, देहरादून, हरिद्वार, मेरठ, लखनऊ जैसे शहरों तक बड़े भूकंप के झटके पहुंच सकते हैं, खासकर नरम मिट्टी पर बनी पुरानी और कमजोर इमारतों के लिए खतरा ज्यादा होता है। उत्तराखंड में पहाड़ी ढलानों पर तेजी से हो रहा निर्माण इस जोखिम को और बढ़ाता है।

आम लोगों के लिए व्यावहारिक सलाह यही है:

  • नया घर बनवा रहे हैं तो भूकंपरोधी भवन मानकों (BIS कोड IS 1893 और IS 13920) का पालन करवाएं और लाइसेंसशुदा स्ट्रक्चरल इंजीनियर से नक्शा पास कराएं।
  • पुराने मकान में दरारें हों तो रेट्रोफिटिंग के बारे में विशेषज्ञ से सलाह लें; भारी अलमारी और सिलेंडर को दीवार से बांधकर रखें।
  • परिवार के साथ ‘झुको, ढको, पकड़ो’ (Drop, Cover, Hold) का अभ्यास करें और घर में टॉर्च, पानी, दवाइयां और जरूरी कागजात वाला इमरजेंसी किट रखें।
  • भूकंप की आधिकारिक जानकारी के लिए राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) और NDMA जैसे सरकारी स्रोतों पर भरोसा करें, अफवाहों पर नहीं।

आगे क्या

वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय में बड़ा भूकंप कब आएगा, यह कोई नहीं बता सकता, इसलिए असली जवाब तैयारी में है। ऐसे अध्ययन सरकारों को भवन नियम सख्ती से लागू करने, स्कूल-अस्पताल जैसी अहम इमारतों की जांच और आपदा प्रबंधन की योजना बेहतर करने का आधार देते हैं। उम्मीद है कि उत्तराखंड सरकार और आपदा प्रबंधन एजेंसियां इन नतीजों को अपनी जोखिम-योजना में शामिल करेंगी। TrendFlash इस विषय पर किसी भी आधिकारिक प्रतिक्रिया या नई जानकारी पर नजर रखेगा।

स्रोत: Earth and Planetary Science Letters (DOI: 10.1016/j.epsl.2026.120376), EGU General Assembly 2026 सार (EGU26-4678), इंडिया टुडे, टाइम्स ऑफ इंडिया, आजतक।

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