सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) तमिलनाडु की उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी, जिसमें औद्योगिक संबंध संहिता (IR Code) 2020 में “उद्योग” की परिभाषा को चुनौती दी गई है। द हिंदू और लाइवलॉ की रिपोर्टों के आधार पर इस मामले का ब्योरा यहां है।
याचिका में क्या कहा गया
द हिंदू के अनुसार AITUC तमिलनाडु ने संहिता में “उद्योग” की परिभाषा को “बेहद अस्पष्ट” (deliciously vague) बताया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन और अधिवक्ता आरती राजन पेश हुए। संहिता की धारा 2(p) के तहत उद्योग का मतलब ऐसी संस्था है जो नियोक्ता और कामगार के सहयोग से वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन, आपूर्ति या वितरण की व्यवस्थित गतिविधि चलाती है, ताकि मानवीय इच्छाओं की पूर्ति हो सके।
शंकरनारायणन ने दलील दी कि परिभाषा से धर्मार्थ, सामाजिक या परोपकारी सेवा में लगी संस्थाओं, “उचित सरकार की संप्रभु कार्यों से जुड़ी किसी भी गतिविधि” और “केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किसी अन्य गतिविधि” को बाहर रखा गया है। उनके अनुसार यह परिभाषा “ट्रिपल टेस्ट” की जरूरतों को पूरा नहीं करती।
क्या है ट्रिपल टेस्ट
लाइवलॉ के अनुसार 1978 में सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा मामले में यह कसौटी तय की थी। इसके तहत कोई गतिविधि “उद्योग” तब मानी जाती है जब वह:
- व्यवस्थित और संगठित गतिविधि हो;
- नियोक्ता और कर्मचारी के सहयोग पर आधारित हो;
- मानवीय जरूरतों की पूर्ति के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन या वितरण करती हो (केवल आध्यात्मिक या धार्मिक सेवाओं को छोड़कर)।
द हिंदू के अनुसार उस फैसले ने अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और नगरपालिकाओं तक को “उद्योग” के दायरे में ला दिया था।
याचिकाकर्ता की दलीलें
लाइवलॉ के मुताबिक याचिका संहिता की धारा 2(p)(ii) के उन खंडों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती है जो धर्मार्थ, सामाजिक या परोपकारी सेवा, संप्रभु कार्यों से जुड़ी गतिविधियों और केंद्र द्वारा अधिसूचित किसी भी अन्य गतिविधि को बाहर करते हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि बहिष्करण 1978 के फैसले में मानी गई संकीर्ण संप्रभु छूट से कहीं ज्यादा व्यापक है और इससे कल्याण योजनाएं, शोध संस्थान और जनसेवा निकाय भी बाहर हो सकते हैं। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19(1)(c) और 21 का हवाला है। उसका तर्क है कि इससे धर्मार्थ अस्पतालों और कल्याण संस्थाओं जैसे प्रतिष्ठानों के कामगार औद्योगिक विवाद निपटारे की वैधानिक व्यवस्था तक पहुंच से वंचित हो सकते हैं और अवैध छंटनी जैसी शिकायतें श्रम न्यायालयों में नहीं उठा पाएंगे। ये याचिकाकर्ता के तर्क हैं।
अगस्त 2026 का नौ जजों की पीठ का फैसला
द हिंदू के अनुसार अगस्त 2026 में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की पीठ ने औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2(j) में “उद्योग” की 1978 वाली व्याख्या की समीक्षा की थी। बहुमत ने कहा कि नवंबर 2025 में लागू औद्योगिक संबंध संहिता की धारा 2(p) 1978 की व्याख्या के “बोझ” से नहीं दबेगी। मुख्य न्यायाधीश ने ट्रिपल टेस्ट के “परिष्करण” का सुझाव भी दिया, पर कहा कि यह केवल एक “सोचा-समझा मत” है। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने सहमति जताई। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने असहमति जताते हुए संदर्भ को “अनुचित” बताया; न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां के साथ साझा एक स्वतंत्र राय लिखकर उनका समर्थन किया। लाइवलॉ के अनुसार याचिकाकर्ता का कहना है कि उस फैसले में संहिता की धारा 2(p) का सवाल खुला छोड़ा गया था, इसलिए याचिका निरर्थक नहीं है।
सुनवाई की अगली तारीख पर रिपोर्टों में फर्क
द हिंदू के अनुसार मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत याचिका पढ़ेगी और मामले को जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेगी। लाइवलॉ के अनुसार मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले को अगले महीने के लिए अस्थायी रूप से सूचीबद्ध किया। अंतिम तारीख अदालत की सूची से ही पता चलेगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
औद्योगिक संबंध संहिता कब लागू हुई?
रिपोर्टों के अनुसार नवंबर 2025 में।
याचिका किसने दायर की?
AITUC तमिलनाडु ने।
सुप्रीम कोर्ट ने अभी क्या किया है?
सुनवाई के लिए सहमति दी है। कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
नोट: जानकारी 28 अक्टूबर 2026 तक की रिपोर्टों पर आधारित है।

