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6 नवम्बर 2026, शुक्र

गन्ना किसानों के लिए उच्च स्तरीय समिति: महाराष्ट्र-कर्नाटक की शिकायतों पर एक हफ्ते में गठन

कर्नाटक के श्रीरंगपट्टण के पास लहराता गन्ने का खेत

केंद्र सरकार ने सोमवार को महाराष्ट्र और कर्नाटक के गन्ना किसानों की शिकायतों पर उच्च स्तरीय संयुक्त समिति बनाने का फैसला किया। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और खाद्य मंत्री प्रहलाद जोशी ने नई दिल्ली के पूसा परिसर में करीब तीन घंटे किसानों के प्रतिनिधियों से बात की। बैठक में करीब 80–90 किसान संगठनों के प्रतिनिधि और राज्य मंत्री भी शामिल रहे।

समिति एक हफ्ते के भीतर गठित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें केंद्र, दोनों राज्य सरकारें, किसान संगठन, चीनी मिलें तथा विषय विशेषज्ञ व वैज्ञानिक शामिल होंगे।

किसान क्या मांग रहे हैं

2026–27 पेराई सीजन 1 अक्टूबर से शुरू हो चुका है। किसान उत्पादन लागत बढ़ने का हवाला देते हुए ऊंचे समर्थन मूल्य की मांग कर रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य (MSP) को ₹31 प्रति किलो से बढ़ाकर ₹50 प्रति किलो करने की भी मांग रखी। ये मांगें किसानों की ओर से हैं; सरकार ने अभी नई MSP घोषित नहीं की है।

समिति किन मुद्दों पर गौर करेगी

चौहान के बयान और बैठक के बाद जारी जानकारी के मुताबिक चर्चा में जमीनी समस्याएं शामिल रहीं:

  • मिलों द्वारा बताई गई रिकवरी दरों में विसंगति
  • तौल (वेइंग) और कथित कटौती
  • वेस्टेज और लैब टेस्टिंग के मानक
  • फसल बीमा से जुड़े मुद्दे
  • भुगतान संबंधी शिकायतें

कृषि मंत्री ने कहा कि जो किसान अन्न देते हैं, उनका शोषण किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। रिकवरी छिपाने या गलत आंकड़े दिखाने जैसे आरोपों को उन्होंने संवेदनशील मुद्दा बताया। समिति तकनीकी पहलुओं की जांच कर तय समयसीमा में सिफारिशें सौंपेगी।

महाराष्ट्र-कर्नाटक क्यों केंद्र में हैं

ये दोनों राज्य देश के प्रमुख गन्ना और चीनी उत्पादक इलाकों में गिने जाते हैं। पेराई शुरू होते ही मिल और किसान के बीच रिकवरी प्रतिशत, नमी कटौती और भुगतान की समय-सारिणी पर विवाद पुरानी कहानी है। राज्य सरकारें अक्सर केंद्र से एफआरपी या राज्य सलाहकार मूल्य में बढ़ोतरी की मांग करती रही हैं। इस बैठक में राज्य मंत्रियों की मौजूदगी बताती है कि मामला अंतर-सरकारी समन्वय का भी है।

रिकवरी विवाद आम आदमी की भाषा में

गन्ने से कितनी चीनी निकलती है, उसे रिकवरी कहते हैं। रिकवरी ऊंची हो तो उसी वजन से मिल को ज्यादा चीनी मिलती है—और सिद्धांत रूप में किसान को भी बेहतर आधार मिलना चाहिए। अगर तौल में कटौती या लैब रिपोर्ट में गड़बड़ी का आरोप लगे तो किसान को घाटा और अविश्वास दोनों होता है। समिति से अपेक्षा है कि माप, लैब और ऑडिट के साफ नियम सुझाए।

पेराई सीजन और भुगतान चक्र

गन्ना किसान अक्सर मिल को गन्ना देने के बाद भुगतान की किस्तों का इंतजार करते हैं। देरी हो तो घरेलू खर्च, बीज-खाद का कर्ज और मजदूरी सब अटक जाते हैं। इसलिए समिति सिर्फ तकनीकी रिकवरी नहीं, बल्कि भुगतान की समयबद्धता और विवाद निपटान तंत्र पर भी गौर करे—यह किसानों की सबसे सीधी उम्मीद है। उपभोक्ताओं को याद रखना चाहिए कि चीनी की खुदरा कीमत कई बातों से तय होती है: गन्ना लागत, मिल मार्जिन, परिवहन, स्टॉक और सरकारी नीति। एक समिति की सिफारिश तुरंत शेल्फ रेट नहीं बदल देती।

आप पर क्या असर पड़ेगा

गन्ना किसानों के लिए समिति रिकवरी, तौल और भुगतान की पारदर्शिता तय करने का मौका है—अगर सिफारिशें समय पर लागू हों। मिल मजदूरों और ट्रांसपोर्टर्स के लिए सुचारू पेराई रोजगार स्थिर रखती है। आम उपभोक्ता के लिए संदेश यह है कि गन्ना मूल्य और चीनी MSP की बहस आगे खुदरा कीमतों को छू सकती है—लेकिन अभी कोई नई खुदरा दर लागू नहीं हुई। महाराष्ट्र-कर्नाटक के किसान परिवारों को राज्य कृषि विभाग और मिल नोटिस ध्यान से पढ़ने चाहिए।

आगे क्या?

समिति सिफारिशें सौंपेगी; तब तक पेराई जारी रहेगी। कर्नाटक मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के दिल्ली दौरे की खबरें भी गन्ना मूल्य मांग से जुड़ी बताई गईं। अंतिम फैसला मंत्रालय/सरकार स्तर पर ही आएगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

गन्ना समिति कब बनेगी?

केंद्र ने कहा है कि उच्च स्तरीय समिति एक सप्ताह के भीतर गठित की जाएगी।

समिति में कौन होंगे?

केंद्र व राज्य प्रतिनिधि, किसान संगठन, चीनी मिलें, विशेषज्ञ और वैज्ञानिक।

किसानों ने चीनी MSP कितनी मांगी?

रिपोर्टों के अनुसार ₹31/किलो से बढ़ाकर ₹50/किलो—यह मांग है, घोषित नीति नहीं।

क्या सपोर्ट प्राइस अभी बढ़ गया?

नहीं। अभी समिति गठन और सिफारिशों का इंतजार है।

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